घर परिवार – योग द्वारा मानसिक संतुलन

Posted on September 28 2013 by yogesh

घटना तथा प्रसंगों को वास्तविक स्थिति में न देखकर हम अपना मानसिक संतुलन खो देते हैं क्योंकि इस स्थिति में हमारा अहम भाव हम पर हावी रहता है. हम तनाव से भयभीत हो जाते हैं मगर यदि हम अधिक जागरूकता से परिस्थिति को समझने की चेष्टा करें तो हम तनाव से डरने के स्थान पर उसका समाधान करने में व्यस्त हो जाएंगे.

अक्सर हमारे जीवन में आनेवाली चिंता, दुख और तनाव को हम बड़ा रूप देते हैं और भूतकाल के अनुभवों से कुछ नहीं सीखते. योग हमें इन परिस्थितियों से ऊपर उठकर ‘दृष्टा’ भाव अपनाना सिखाता है. हमारी समझ तथा जागरूकता बनाए रखना है और संपुर्ण श्रद्धा के साथ परिस्थिति को स्वीकार करके अपने अहंकार को हटाना है.

हमारी भावनाएं हमारे अहयम् भाव से गहरा संबंध रखती हैं. हम बहुत ही सीमित दृष्टि से चीजों को देखते हैं जो हमें समझदारी नहीं दे पाती. ईश्वर से हम प्रार्थना करें कि यह आपकी बनाई सृष्टि है, आपने मुझे भी बनाया है. जब आप ही कर्ता हैं तो आप ही कठिनाईयों का निराकर भी बताईए. जैसे छोटा बच्चा अपने माता पिता पर संपुर्ण विश्वास रखता है उसी प्रकार हमें ईश्वर पर श्रद्धा रखनी चाहिए.

ईश्वर हमें उतनी ही मुश्किलें देता है जितनी हम झेल पाते हैं. ईश्वर किसी को भी उसके हिस्से से अधिक तनाव नहीं देता है. हम जिसे कठिनाई मानते हैं वह वास्तव में कठिनाई नहीं होती. यह हमारे जीवन का एक अंग ही है. हमें समझदारी से ऐसा मानना चाहिए.

तनाव हमारे जीवन का एक हिस्सा है. केवल हमारी मान्यताएं गलत होती हैं. तनाव को हम हमेशा डर की नजर से देखते हैं. जहां तनाव नहीं होता वहां भी हम तनाव को ढूंढते हैं. कभी हमें पता ही नहीं होता कि ऐसी परिस्थिति में हम कैसा व्यवहार करें. यह सीखने पर हम अपना विकास कर सकते हैं.

तनाव दैनिक जीवन का साथी

दैनिक जीवन में तनाव को कैसे सुलझाया जाए?

तनाव हमारे जीवन का साथी है. उससे मुक्त होना आसान नहीं है किंतु योग हमें तनावरहित जीवन जीने की कला सिखाता है.

इस तनाव से मुक्त होने के लिए योग में पांच कोष दिए हैं:

1. अन्नमय कोष 2. प्राणमय कोष 3. मनोमय कोष 4. विज्ञानमय कोष 5. आनंदमय कोष

1 अन्नमय कोष : भोजन का सीधा असर हमारे दिमाग पर पढ़ता है. भोजन हमारे शरीर का भरणपोषण करता है. हल्का सात्विक भोजन मनुष्य को तंदुरुस्त रखता है. इसलिए योग में सात्विक भोजन का बहुत महत्व है. भोजन दिन में चार बार, किंतु समय पर खाना चाहिए. राजसिक भोजन जैसे मिठाई से बचना चाहिए और तामसिक भोजन जैसे मसाले, मांस से भी बचना चाहिए.

2 प्राणमय कोष : शरीर और मन को संतुलित रखने के लिए हमें प्राण की जरूरत होती है और उसे पाने के लिए सही क्रिया करनी है. जैसे गुनगुने पानी से रगड़ कर स्नान, पैदल चलना, सही स्थिति में बैठना, पालथी मार कर बैठना. योग आसन करना जैसे त्राटक, अनुलोम विलोम(प्राणायम) निशपंद्भाव और श्वासन.

3 मनोमय कोष : हमें अपने जीवन को कैसे जीना है यह हम तय कर सकते हैं. हमें अपने जीवन से क्या चाहिए? हमें दूसरों की वजह से दुखी नहीं होना है बल्कि उसमें अच्छाई देखना है. हम अपनी परिस्थितियों को नहीं बदल सकते किंतु हम अपने आप को बदल सकते हैं. हमारे देखने का नजरिया सकारात्मक होना चाहिए. इससे हम निरोगी बने रहेंगे. अपनी कला को विकसित रूप देना जैसे संगीत सीखना, चित्रकला करना. इससे हम व्यस्त रहेंगे. हमें अपनी बुद्धि से काम करना है शरीर के माध्यम से हम सब कुछ कर सकते हैं.

4 विज्ञानमय कोष : बुद्धि से भावनाओं पर नियंत्रण रखना आसान हो जाता है. योग हमें सिखाता है जो काम करें उसी पर ध्यान दें. अगर हम दूसरों की तकलीफ क देखेंगे तो हमारी तकलीफ बहुत नजर आएगी.

5 आनंदमय कोष : ईश्वर की सत्ता को समझना है. बहुत व्यक्ति एक कार्य करते हैं किंतु वह पूर्ण नहीं होता. जब चीजें सही ढंग से होगी तो कार्य अवश्य पूर्ण होगा. ईश्वर हमारे साथ है यह विश्वास ही हमें मजबूत बनाता है. हमें अपने तनाव को स्वंय हटाना है. इसके लिए बहुत मेहनत करनी है-योगिक आसन जैसे- सुखासन, तालासन, उत्कटासन, पर्वतासन, यष्टीकासन, योगमुद्रा, भुजंगासन करें. प्राणायाम 4-9 श्वासन हमारे मन को शांत और शरीर को शिथिल बनाते हैं.

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