बीजेपी ने आडवाणी को फिर किया नजरअंदाज

Posted on July 11 2015 by pits

नई दिल्ली : बीजेपी के मौजूदा नेतृत्व और पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के बीच बने मतभेद एक बार फिर सामने आ गए।  आपातकाल की 40वीं वर्षगांठ के मौके पर पार्टी समर्थित श्यामा प्रसाद मुखर्जी फाउंडेशन की तरफ से आयोजित एक कार्यक्रम में आडवाणी मौजूद नहीं थे।

एक समय था जब अटल बिहारी वाजपेयी के साथ बीजेपी के दिग्गज नेताओं की गिनती में शामिल और इमर्जेंसी कानून के तहत 25 जून 1975 को पहले गिरफ्तार होने वाले नेताओं में शुमार आडवाणी बीजेपी के हर प्रमुख कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति तय होती थी, लेकिन इस साल ऐसा कुछ नहीं हो रहा है।
इस कार्यक्रम में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। वहां पार्टी के दूसरे वरिष्ठ नेता वी के मल्होत्रा और दूसरे पदाधिकारी मौजूद थे। कार्यक्रम वाले दिन दिल्ली में मौजूद आडवाणी के एक करीबी ने कहा, ‘हमें ऐसे किसी कार्यक्रम के बारे में जानकारी नहीं है। हमें नहीं पता कि न्योता भेजा गया है या नहीं।’

एसपी मुखर्जी फाउंडेशन के संस्थापकों में एक बीजेपी के उपाध्यक्ष विनय सहस्रबुद्धे ने इकनॉमिक टाइम्स से बातचीत में कहा कि आडवाणीजी को न्योता नहीं दिया गया होगा, यह मुमकिन नहीं। हालांकि सहस्रबुद्धे ने कार्यक्रम के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी, पर यह जरूर है कि कार्यक्रम की छोटी-मोटी चीजों से उनका वास्ता नहीं था।

कार्यक्रम में आडवाणी की गैरमौजूदगी इसलिए अहमियत रखती है कि कुख्यात मीसा यानी मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्यॉरिटी ऐक्ट के तहत गिरफ्तार किए गए संघ के लगभग सभी नेताओं को न्योता भेजा गया था और उनको कार्यक्रम में शॉल देकर से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम आपातकाल के दौरान मीसा के तहत गिरफ्तार किए गए लोगों को सम्मानित किया गया था, लेकिन उसमें संघ के सबसे मशहूर कैदी को ही नजरअंदाज कर दिया गया।

यह दूसरी बार है, जब पार्टी के दिग्गज नेता को ऐसे किसी कार्यक्रम में नजरअंदाज किया है। पहली बार दिसंबर में पार्टी के संस्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में उनको नहीं बुलाया गया था। उस कार्यक्रम में वी के मल्होत्रा को लंबे समय तक पार्टी की सेवा करने के लिए सम्मानित किया गया था।

शाह ने इस मौके पर मौजूद समूह को संबोधित करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति विशेष के बजाय विचारधारा को वोट देकर दोबारा आपातकाल लगने से रोका जा सकता है। उन्होंने कहा, ‘अगर आप किसी व्यक्ति को वोट देते हैं तो आप आपातकाल का रास्ता साफ करते हैं लेकिन विचारधारा के साथ जाने पर ऐसा नहीं होगा। आपातकाल की बड़ी वजह विरोध के प्रति असहिष्णुता थी।’

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