हीरा कारोबार में चीन ने कम की चमक

Posted on January 11 2015 by pits

नई दिल्लीः भारत लंबे समय से विश्व का सबसे बड़े हीरा तराशकार रहा है लेकिन अब उसे चीन में बढ़ते उत्पादन से चुनौती मिल रही है जिससे इस कारोबार में भारत की चमक कम हुई है. गौरतलब है कि इस वजह से भारत को अपनी बाजार हिस्सेदारी बचाए रखने के लिए अपने सहयोगी और कच्चे हीरे के प्रमुख आपूर्तिकर्ता रूस की मदद लेने के लिए बाध्य होना पड़ा है.

बता दें कि पुराने समय से ही भारत कच्चे हीरों की आपूर्ति के लिए एंटवर्प, तेल अवीव और दुबई जैसे कारोबारी केंद्रों के बिचौलियों पर निर्भर रहा है. इन कारोबारी केंद्रों में कच्चे हीरे मुख्य रूप से रूस और अफ्रीका से आते हैं. विश्व में उत्पादित हीरों को दुनियाभर में बिक्री से पहले कटाई एवं तराशी के लिए भारत भेजा जाता है लेकिन चीन अफ्रीकी खानों में हीरे खरीदकर इस कारोबार चक्र को तोडऩे में सफल रहा है, जिनमें चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी है. इसके चलते पिछले 5 वर्षों के दौरान चीन का तराशे हीरों का शुद्ध निर्यात 72 फीसदी बढ़कर 8.9 अरब डॉलर रहा है हालांकि इस दौरान भारत का निर्यात 49 फीसदी बढ़कर 14 अरब डॉलर रहा है मगर इस साल निर्यात में भारी गिरावट आई है.

भारतीय औद्योगिक संस्था एसोचैम के एक अधिकारी संदीप वारिया के अनुसार अफ्रीका से कच्चे हीरों की चीन की तगड़ी खरीदारी से भारतीय विनिर्माताओं को कम आपूर्ति मिल रही है. उन्होंने कहा कि, ‘देशभर में बहुत सी इकाइयों को घाटे की वजह से कर्मचारियों को हटाना पड़ा है.’ संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक तराशे हीरों के वैश्विक बाजार में चीन का हिस्सा पिछले एक दशक में तिगुना यानी 17 फीसदी हो गया है. वहीं भारत का हिस्सा 19 से 31 फीसदी के बीच रहा है.

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आभूषण क्षेत्र के नेताओं और संस्थाओं की 29 दिसंबर को बैठक बुलाई. बैठक में इस बात पर चर्चा हुई कि यह क्षेत्र किस तरह ‘मेक इन इंडिया’ अभियान का हिस्सा बन सकता है. गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ने इस साल 15 अगस्त को ऐतिहासिक लाल किले से इस अभियान की शुरूआत की थी.

देश के वस्तु निर्यात में रत्न एवं आभूषणों का हिस्सा करीब 13 फीसदी है. वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण पिछले 2 वर्षों में रत्न एवं आाभूषणों का निर्यात घटा है लेकिन भारत विश्व में इस क्षेत्र में अपनी जगह बनाने में सफल रहा है, क्योंकि पूरे विश्व में उत्पादित 13 में से 11 हीरों की तराशी यहां होती है. जी.जे.ई.पी.सी. के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत का रत्न एंव आभूषण निर्यात 2013-14 में 34.99 अरब डॉलर रहा, जो 2012-13 में 39.14 अरब डॉलर और 2011-12 में 43.21 डॉलर था.

ज्यादातर भारतीय ज्वैलर गहने बनाते हैं और कच्चे गहनों का विदेशी बाजारों में हॉलमार्किंग और ब्रांडिंग के लिए निर्यात करते हैं, इसलिए गहनों का भारत में विनिर्माण होने के बावजूद इन पर ऐसा कोई चिन्ह नहीं होता है, जिससे यह पता चले कि ये भारत में बने हैं इसलिए पहचान के लिए सरकार यहां विनिर्मित प्रत्येक गहने के लिए होलोग्राम बना सकती है. कारोबारियों का मानना है कि होलोग्राम जैसा एकसमान हॉलमार्क ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को प्रोत्साहित करने का एक तरीका हो सकता है.

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