ओंकारेश्वर ज्योर्तिलिंग पर जल चढ़ाकर ही तीर्थ यात्रा पूरी होगी

Posted on December 7 2014 by pits

इंदौर से करीब 80 किमी. की दूरी पर ओंकारेश्वर ज्योर्तिलिंग स्थित है. इस स्थान पर नर्मदा नदी दो घाटों में बंट जाती है तथा मान्धाता या शिवपुरी द्वीप का निर्माण करती है. इस द्वीप का आकार ओम जैसा है. इस ओंकार का भौतिक विग्रह ओंकार क्षेत्र है जिसमें 68 तीर्थ, 33 करोड़ देवी-देवता परिवार सहित निवास करते हैं एवं 2 ज्योतिस्वरूप लिंगों सहित 108 प्रभावशाली शिवलिंग हैं. ओंकारेश्वर ज्योर्तिलिंग दो स्वरूपों में विराजित है. पहला ममलेश्वर अथवा अमरेश्वर और दूसरा ओंकारेश्वर.

ओंकारेश्वर नगरी का वास्तविक नाम मान्धाता है क्योंकि राजा मान्धाता ने नर्मदा के तट पर बसे पर्वत पर प्रचण्ड तप कर भोलेनाथ को खुश किया और जब भोलेनाथ ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए तो उनसे इसी स्थान पर वास करने का वर मांगा तत्पश्चात इस र्तीथ का नाम ओंकार-मान्धाता पड़ गया. इस मंदिर में पूजा उपासना करने से समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं. मान्यता है दोनों शिवलिंग विभिन्न होते हुए भी एक ही शक्ति स्वरूप हैं.

शास्त्रों के मतानुसार मनुष्य चाहे संपूर्ण तीर्थों का भ्रमण कर लें मगर जब तक ओंकारेश्वर ज्योर्तिलिंग में जल लाकर नहीं चढ़ाता तब तक उसके सभी तीर्थ अधूरे ही रहते हैं. जो मनुष्य इस तीर्थ स्थल पर प्राण त्यागता है उसका वास शिवलोक में होता है. ममलेश्वर अथवा ओंकारेश्वर मंदिर के दर्शन के साथ ही ओंकार पर्वत की परिक्रमा का विशेष महत्व है. यहां भोलेनाथ को चने की दाल का प्रशाद चढ़ाया जाता है. सुबह के समय नदी और घाटों के नजारे कई गुना ज्यादा सुंदर दिखाई देते हैं. यात्रा के दौरान ऐतिहासिक घाटों, प्राकृतिक खूबसूरती को संजोए पर्वत, आश्रमों, डेम, बोटिंग आदि का लुत्फ भी लिया जा सकता है.

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