बच्चों के दिल की बात को समझें

Posted on November 23 2014 by pits

कुछ माता-पिता अपने बच्चों पर हद से ज्यादा नियंत्रण रखते हैं और उनकी छोटी-छोटी बैटन पर नजर रखकर उनपर पाबंदी लगाते हैं. गौरतलब है कि घर से बाहर जाने से लेकर वापस आने तक अपने बच्चों पर हर संभव नजर रहती है. यहां तक कि वह अपने बच्चों को गली या पार्क में दूसरे बच्चों के साथ इस डर से नहीं खेलने देते क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि बच्चों को चोट लग सकती है या उन्हें कोई बहला कर आसानी से ले जा सकता है.

हालाँकि हम आपको बता दें कि अपने माता-पिता की ऐसी हरकतों की वजह से बच्चे भी परेशान रहते हैं क्योंकि उन्हें पेरैंट्स की तरफ  से जो स्पेस मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल पाती. इस वजह से वे चिड़चिड़े होने लगते हैं. कभी-कभी जरूरत से ज्यादा ख्याल भी बच्चों के लिए अच्छा नहीं होता. ऐसे माता-पिता सुरक्षा की आड़ में बच्चों पर सख्त नियंत्रण रखने की कोशिश करते हैं. हरदम साए की तरह बच्चों का पीछा करना, एस.एम.एस., फोन कॉल आदि के माध्यम से लगातार बच्चों के संपर्क में रहना, यह सब बातें अभिभावक अपने बच्चे की भलाई के लिए ही करते है परंतु अक्सर वे यह नहीं समझते कि कोई भी चीज बहुत ज्यादा हो जाए तो बुरी होती है. अपने बच्चों का जरूरत से ज्यादा ख्याल रख कर ऐसे अभिभावक दरअसल उन्हें अपने जीवन में चुनौतीपूर्ण स्थितियों का सामना करने से वंचित कर देते हैं. इसका असर यह होता है कि बच्चे असंवेदनशील और गैर-जिम्मेदार हो जाते हैं.

एक अभिभावक के रूप में महसूस करना चाहिए कि चिंता करनेवाले और जरूरत से ज्यादा ख्याल रखने वाले अभिभावक के बीच एक बहुत ही बारीक रेखा है. अपने बच्चे के जीवन में नियमित रूप से हस्तक्षेप करके आप असल में अच्छा करने की अपेक्षा उसका नुक्सान ज्यादा कर रहे हैं. गौर करें कि जो बच्चा बहुत ही ज्यादा चिंतित, परेशान और सुरक्षा का ख्याल रखने वाले अभिभावकों की देख-रेख में बड़ा होता है, उम्र बढऩे के साथ वह कभी भी आनेवाली जिम्मेदारियों को उठा पाने में सक्षम नहीं होगा इसलिए अपने बच्चे को  प्यार भरी देखभाल, निगरानी और समर्थन में बड़ा होने दें, न कि जरूरत से ज्यादा सुरक्षा में. इसके लिए बस थोड़ा-सा अलर्ट रहने तथा कुछ खास बातों को गांठ बांधने की जरूरत है. आईए जानते हैं ऐसी ही कुछ और बातें.

अपने बच्चे को जानें: सबसे पहले इस बात पर गौर करें कि आपका बच्चा जिस उम्र में है उसमें उसका कितना ख्याल रखने की आवश्यकता है. इसके लिए अपने बच्चे पर नजर रखें तथा उसकी शक्ति, कमजोरी, जरूरत और प्राथमिकता को जानें. इससे आपको उन स्थितियों को जानने में सहायता मिलेगी कि कब आपको उसकी सहायता करनी होगी और कब उसे खुद अपने स्तर पर निपटने के लिए छोड़ देना होगा.

खुल कर बात करें: हर शाम अपने बच्चे के साथ फ्रेंडली बात करें और उसे अपनी सारी चिंता खुल कर सांझा करने के लिए प्रेरित करें. अपने बच्चे की बात सुनें और उससे कहें कि वह आपको बताए कि किसी खास स्थिति में वह आपसे क्या चाहता या चाहती है.

बदलें अपना व्यवहार: जब कभी आप अपने बच्चे के व्यवहार को बदलना चाहें, तो उससे पहले खुद को उसके स्थान पर रखें और उसके नजरिए से सोचें कि यदि आपको किसी खास तरह से सोचने, कार्रवाई करने या निर्णय लेने के लिए मजबूर किया जाए तो आप कैसा महसूस करेंगे. इससे आप उसकी मानसिकता को आसानी से समझ सकेंगे.

 

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