दूसरों को क्षमा कर देने से इंसान बन जाता है बड़ा

Posted on November 23 2014 by pits

इंसान को दूसरे इंसान से क्षमा मांगने में बहुत समय लग जाता है. क्षमा मांगना एक बहुत ही मुश्किल कम है लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण आदत है दूसरों को क्षमा करना. हम दूसरों की भूल को यदि मानस पटल पर पत्थर की लकीर की तरह अंकित कर लेते हैं और उसे मन से मिटाने अर्थात भूलने का नाम ही नहीं लेते तो अपना ही मन बोझिल अथवा छिद्र-छिद्र कर लेते हैं.

सुलगती हुई राख या सड़ते हुए कचरे को मन में भर देना, अपनी ही बुद्धि का दिवालियापन है. दूसरे की भूल का अपने मन को शूल अथवा आंख का बबूल बना लेना तो अपने लिए स्वयं सूली तैयार करना अथवा कांटों की शैया तैयार करना है फिर यदि हम दूसरों की भूलों के लिए उन्हें क्षमा नहीं करते तो भगवान से अपने पापों और अपराधों की थोड़ी भी क्षमा की आशा करने के भी योग्य कैसे बन सकते हैं? अत: हम मन को विशाल अथवा विराट करें और क्षमा करें, इससे मन को शांती मिलती है.

यह कलियुग है. यहाँ भूल तो सभी से होती रहती है. खराब आदतें भी थोड़ी-बहुत सभी में हैं इसलिए इन गल्तियों को दिल से लगाने की जगह क्षमा करन सीखना चाहिए. अब अपने जीवन में क्षमा का अध्याय खोलो और कुछ दान नहीं करते तो क्षमा दान ही कर दो. क्षमा न करने से व्यक्ति स्वयं ही ‘कूड़ेदान’ या ‘नादान’(बेसमझ) बन जाता है. बता दें कि ‘क्षमा’ का अर्थ यह नहीं है कि धोखेबाज, मक्कार, अत्याचारी, दुष्ट, निर्दयी व्यक्ति को ऐसा क्षमा करो जिससे कि वह आपको की नुक्सान पहुचाएं. दुष्ट को बार-बार दुष्टता करने की खुली छूट मत दो.

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