सप्ताह कि खास मुलाकात

Posted on October 1 2014 by pits

मीना हल्दार- गायिका

मेरा पूरा जीवन संगीत के लिए समर्पित है…..

गायन को अपने जीवन का पहला मकसद मानने वाली मीना हलदार ने जीवन की हर मुश्किलों का सामना किया लेकिन कभी भी संगीत को छूटने नहीं दिया. नौकरी करते हुए मीना जी ने अपने इस हुनर को और निखारा और संगीत में अपना योगदान देती रही. बड़ोदरा के ‘बगलामुखी देवी मां’ जैसे भारत के सबसे बड़े देवी दरबार में यह अपने आवाज का जादू बिखेरती हैं. आज उनके द्वारा गाया हुआ भजन ‘माता मेरी माता…तेरा ही जगराता’ लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है. इनसे बात की हमारी संवाददाता रजिया निसार ने…   

गायन की तरफ आपका रूझान कैसे हुआ?

वास्तव में संगीत मेरे खून में है. मेरे दादाजी बड़े पैमाने पर कीर्तन भजन में भाग लेते थे और उनको देखते हुए मेरा रुझान भी इसी तरफ हुआ. मैंने 5-6 वर्ष की उम्र से ही गाना शुरू कर दिया था. मेरे गाने की शुरूआत स्कूल के दिनों से ही हो गई थी. स्कूल में सुबह की प्रार्थना मैं ही गाती थी. फिर कॉलेज में राज्य स्तर के प्रतिभागों में मैं पहला स्थान हासिल करती थी. धीरे धीरे इस तरफ आगे बढती ही गई.

आपकी अबतक कितने एल्बम मार्किट में आए हैं?

मेरे कई एल्बम मार्केट में आ चुके हैं जैसे की ‘यशोदा मैय्या माखन खिलाए’, ‘जय दुर्गे मां’, ‘जय हो विंध्यवासिनी’और अभी हाल ही में इस नवरात्री में ‘माता मेरी माता, तेरा ही जगराता’ नामक एल्बम रिलीज हुआ है. हालाँकि मुझे पहला बड़ा ब्रेक भोजपूरी फिल्म ‘माई की मर्यादा’ नामक फिल्म से टाईटल गाने को गाकर हुई थी. मैंने आकाशवाणी के लिए तकरीबन 15 सालों तक गाया है.

लोगों का कितना साथ मिला आपको?

मुझे लोगों का बहुत प्यार मिला है. मेरी आवाज अलग होने की वजह से भी लोग मुझे सुनना पसंद करते हैं. मुझे सिर्फ हिंदी ही नहीं बल्कि राजस्थानी, गुजराती, भोजपूरी कई भाषाओँ में गाने का मौका मिला और सभी सुननेवालों ने मेरा हौसला बढाया है.

आजकल जिस तरह का संगीत युवाओं को पसंद आ रहा है उस पर आप क्या कहना चाहती है?

देखिए, हमें जैसा म्यूजिक डायरेक्टर बोलता है, हम वैसा ही गाते हैं. हम कलाकार हैं, हमारा काम है गाना गाना और हम वही करते हैं. लोगों की पसंद भी समय के साथ बदली है और हम हम उसी तरह गाने की कोशिश करते हैं जैसा लोगों को पसंद आए.

आपने क्या कहीं गायन की तालीम ली है?

में शुरूआती शिक्षा मेरे घर से ही हो गयी थी लेकिन मैंने क्लासिकल संगीत की शिक्षा प्रकाश शहा गुरूजी से ली है. वो बचपन में मुझे संगीत सीखते थे. शादी के बाद मैं मुंबई आ गई और यहाँ पर मैंने प्रवीन सुल्ताना और उनके पति दिलशाद खान से 9 साल तक शिक्षा प्राप्त की. गायन में मेरे पति ने मुझे पूरा समर्थन दिया.

आपकी आगे की क्या योजना है?

मैं अपने भविष्य के बारे में ज्यादा नहीं सोचती लेकिन एक बात जानती हूँ की मैंने मेरा पूरा जीवन संगीत के लिए समर्पित है. मैं चाहती हूँ की गाते गाते ही मेरी मृत्यु हो. मैं जब तक नौकरी करूँ पूरी निष्ठां से करूँ और उसके बाद मेरा पूरा समय संगीत के लिए समर्पित है. मैं अपने संगीत को कभी समाप्त नहीं होने देना चाहती.

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