हेल्थ टिप्स – नींद नहीं आना भी है एक गंभीर समस्या

Posted on November 25 2013 by yogesh

सोनेकी क्षमता हम में जन्मजात होती है. कई व्यक्तियों को सोना अच्छा लगता है तो कई व्यक्तियों को नींद ही नहीं आती. गौरतलब है कि 20 में से 1 भारतीय निद्रा संबंधी व्याधियों से पीड़ित है. जहांतक नींद में गड़बड़ की बात है तो इसमें भी महिलाएं(6.5 प्रतिशत) पुरुषों (4.3 प्रतिशत) से आगे हैं. यह खुलासा वार्षिक मैडीकल स्कूल द्वारा करवाए गएएक हालिया अध्ययन में हुआ है. इसके साथ ही यह भी खुलासा हुआ है कि घटियानींद लेनेवालों के रिश्तों में समस्याओं तथा हृदय रोग का दो गुना खतरा रहताहै.

निद्रा संबंधी मनोविज्ञानियों के अनुसार नींद के प्रति अत्यधिक जुनून तथापर्याप्त नींद न लेने के साइड इफैक्ट्स समस्या का आधे से अधिक कारण है. एकबार जब आप नींद के प्रति बेचैनी महसूस करना शुरू करते हैं, आप अधिक अलर्टहो जाते हैं और इस जाने-पहचाने अनिद्रा(इनसोम्निया) के दुष्चक्र मेंफंसते  चले जाते हैं. आपकी सोच के विपरीत इसका हल नींद की गोलियों याविस्तृत बैडटाइम रूटीन का अनुसरण नहीं है परंतु नींद  के बारे में अलग ढंगसे सोचना- सीखना होगा.

आपको बता दें कि अच्छी नींद लेने वालों के कोई नियम नहीं होते. आप उनसे पूछ सकते हैं कि  सोने के लिए क्या करते हैं और वे कहेंगे कुछ नहीं. किसी अनिद्रा रोगी सेयही पूछें तो उसका जवाब होगा सब कुछऔर आपको बांह जितनी लम्बी लिस्ट थमादेंगे. कॉफी से परहेज से लेकर, लैवेंडर ऑयल में स्नान तथा आराम देने वालीसी.डीज सुनना. ये सारी गतिविधियां आपको अनिद्रा से अवगत करवाती हैं जोअंतत: स्थिति को और बदतर कर देती हैं.

आपको सबसे पहले यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि अनिद्रा की समस्या आपको घेरती कैसे है. नींद के लिए संघर्ष करने की शुरूआत काम पर तनाव भरे दिन जैसी साधारण बात सेहो सकती है. इसके बाद अगली शाम सोने के समय के आसपास आप बेचैन हो जाते हैंकि क्या आप सो पाएंगे? जैसे ही नींद एक ‘मुद्दा’ बनती है, आप इस पर जरूरतसे ज्यादा ध्यान देने लगते हैं और यह दुष्चक्र शुरू हो जाता है क्योंकि हमअपनी आदत से बंधे होते हैं इसलिए कुछ ही दिनों में दिमाग रात के समय मेंजागना शुरू कर देता है. इससे विशेषज्ञों की भाषा में ‘हाइपर अराऊजल’ कीस्थिति पैदा हो जाती है.

नींद एक प्राकृतिक, शारीरिक प्रक्रिया है. हमारा शरीर जानता है कि इसे कैसेकरना है. सिर्फ हम खुद ही इसके रास्ते में रुकावट बनते हैं. बता दें कि विदेशों में कुछ स्लीपिंग स्कूलों में ‘एक्सैप्टैंस एंड कमिटमैंट थैरेपी’  का इस्तेमाल किया जाता है. इसमेंव्यक्ति को बिल्कुल उसके उलट करना सिखाया जाता है जो वह न सो सकने पर करताहै इसलिए रात को उठ कर ड्रिंक लेने या संगीत सुनने जैसे  कार्यों के विपरीतयह प्रक्रिया अनिद्रा रोगियों को बैड में पड़े रहने को प्रोत्साहित करतीहै और उन्हें नींद न आने की बेआरामी का अनुभव कराती है. यदि आपका दिमागइधर-उधर  घूमता है तो इसे वापस लाएं. इसका उद्देश्य न सोने की बेआरामी केसाथ एक नर्म रिश्ता कायम करना है जो आपके दिमाग को बताएगा कि आपको अब अधिकजागने की जरूरत नहीं है.

वहीं दूसरी ओर लोगों को नींद से जुड़ी कई भ्रांतियां या गलतफहमियां भी होती है. आईए आपको बताते हैं.

भ्रांति नंबर1: गर्म स्नान तथा दूध का ड्रिंक लें.

यह क्यों असफल होती है:सोने  से जुड़ी रिवायतें बुरी खबर है.
नींद एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसे नियंत्रित नहीं किया जा सकता-और घटियारुटीन के द्वारा ऐसा करने का प्रयास करने से बेचैनी और बढ़ सकती है.

भ्रांति नंबर २:जल्दी सोना.
यह क्यों असफल होती है: थोड़ी- सी अधिक नींद लेने के लिए बेड पर जल्दी जाने से रूटीन बदल जाती है. रूटीन में परिवर्तन असल में आपके निद्रा चक्र को बाधित कर देता है जिसकाअर्थ है आप आने वाली रात को अधिक उनींदापन नहीं महसूस करेंगे.

भ्रांति नंबर ३:8 घंटे की बाधारहित नींद का उद्देश्य निर्धारित करना.

यह क्यों असफल होती है: हम सब की नींद की मात्रा जरूरत के अनुसार अलग-अलग होती है. एक रात की अच्छी नींद वह होती है जिससे जागने पर आप आरामदायक और ताजादममहसूस करें. इसमें यह देखने की जरूरत नहीं कि आप कितने घंटे सोए थे.

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