मुस्लिमों को नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण की सिफारिश – डॉ. महेमुदूर रहमान कमिटी

Posted on October 26 2013 by yogesh

मुंबई(िट्स प्रतिनिधि) : महाराष्ट्र सरकार की डॉ. महेमुदूर रहमान कमिटी ने राज्य में मुसलमानों के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आठ से 10 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश की है. गौरतलब है कि समिति की रिपोर्ट गत सोमवार को मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को सौंपी गई. मुसलमानों की शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन का कारणों का पता लगानेके लिए समिति का गठन दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के कार्यकालमें किया गया था.

सरकारी सूत्रों के अनुसार, समिति ने सरकारी नौकरियों में मुस्लिम युवकों की स्थिति, दलित मुसलमानों के हालात, वक्फबोर्ड की जमीन पर प्राइवेट कब्जे की समस्या और समुदाय के शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन की वजह जैसे मुद्दों पर अपनी सिफारिशें दी हैं. डॉ.रहमान ने मुख्यमंत्री चव्हाण को अपनी 200 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी. इस समय उनके साथ अल्पसंख्यक विकास मंत्री आरिफ नसीम खान और अल्पसंख्यक विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव टी. एफ.थेक्केकारा साथ थीं.

आपको बता दें कि मई 2008 में केंद्र सरकार के रिटायर्ड सेक्रेटरी और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति डॉ.रहमान की अध्यक्षता में ‘स्टडी ग्रुप’ का गठन किया गया था. टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस(टीआईएसएस) के प्रो.डॉ.अब्दुल शबान, सरसैय्यद कॉलेज(औरंगाबाद) के पूर्व प्रिंसिपल प्रो.मोहम्मद तिलावत अली, निर्मला निकेतन की डेप्युटी प्रिंसिपल डॉ.फरीदा लांबे, टीआईएसएस की प्रो.डॉ.राणू जैन, एसएनडीटी वीमेंस यूनिवर्सिटी की प्रो.विभूती पटेल व डॉ.वीणा पुनाचा सदस्य के तौर पर शामिल थे.

उल्लेखनीय है कि राजनीतिक, सामाजिक और काफीहद तक आर्थिक तौर पर मजबूत माना जानेवाला मराठा समुदाय जाति के आधार पर महाराष्ट्र में आरक्षण की मांग कर रहा है. उनकी 25 प्रतिशत आरक्षण की मांगपर फैसला किए बिना इस मामले में आगे बढ़ना मुश्किल होगा. लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल इसका समर्थन करते दिखाई दे रहे हैं. इसको लेकर उस पश्चिम महाराष्ट्र में लहर सी उठती दिखाई दे रही है, जो सत्ताधारी कांग्रेस और एनसीपी का राजनीतिक गढ़ रहा है. मराठों को नजर अंदाज करके किसी भी दूसरेवर्ग को आरक्षण देना आसान नहीं कहा जा सकता. वहीं महाराष्ट्र में अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जातियों और वीजेएनटी का आरक्षण मिलाकर 52 प्रतिशत पहुंच गया है. इसमें मुसलमानों और मराठा आरक्षण का फैसला करना पड़े तो इसके लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा. सत्ताधारी पार्टी के पास संसद में इस तरहका बहुमत नहीं है. हालांकि अब देखना यह होगा कि कमिटी के इस सिफारिश के बाद सरकार क्या कदम उठाती है.

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