घर परिवार – आयोजन आगे बढ़ने का

Posted on October 26 2013 by yogesh

प्रश्न: करूणा क्या है?

उत्तर: दूसरों के करूणा को स्वंय: भी महसूस करें. अपने आप को उसकी परिस्थिति में रखकर देखोगे तो उसके प्रति करूणा भाव जागेगा. पर ज्यादातर जब कोई दुखी होता है तो हम अक्सर सोचते हैं कि अच्छा हुआ वह ऐसा ही है, बेवकूफ है. उसे तो अपने कर्मों की सजा मिलनी चाहिए वगैरे, वगैरे. यदि हम दूसरों के दुख में भागीदार बनते हैं तो हम अपने आपको ही मदद करते हैं. हमारा अपना स्वभाव परिवर्तित होता है. उस परिस्थिति में रखकर देखने कानरिय समजझतैं व अपने ही को शुद्ध व शांत बनाने का कार्य करते हैं.

कोई व्यक्ति कैसा भी व्यवहार करें वह अपने स्वभाव से ही करता है. हमें उसकी परिस्थिति को समझना चाहिए और हमें अपना संतुलन बनाए रखना चाहिए. यह एक बहुत प्रसिद्ध उदाहरण फ्लॉरेंस नाइटिंगल का है. जिन्होंने विश्व युद्ध के समय निस्वार्थ भाव से सैनिकों की सेवा की.

यहां हमें सीखना है कि अपनी जागृता के कारण नकारात्मक भावनाओं को सकारात्मक रूप देना है. यही सच्चे अर्थ में योग का मार्ग है.

प्रश्न: मुदिता क्या है?

उत्तर: यहां हमें औरों की खुशी महसूस करनी है. किसी भी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के कारण अपना संतुलन नहीं खिना है, यहां पर एक और गौतम बुद्ध की कहानी से समझ में आता है. एक बार बुद्ध एक जगह से जा रहे हैं. उन्हें एक डाकू मिला जिसने यह तय किया था कि वह 1000 उंगलियों को काटकर उसकी माला अपने गले में डालेगा. उसे अब आखिरी उंगली चाहिए थी. वह बुद्ध के पीछे दौड़ा. पर बुद्ध विचलित नहीं हुए. डाकू को बहुत आश्चर्य हुआ. आजतक उसे ऐसा शांत व संतुलित व्यक्ति नहीं मिला था. मौत का नाम सुनकर लोग कांप जाते थे. पर यहां पर तो दृश्य ही अलग था. डाकू ने जब गौतम बुद्ध से पूछा, तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता’, तो बुद्ध बोले, तुम तो अच्छे आदमी हो. डर कैसा?’ डाकू ने कहा, ’मैं तुम्हें मारनेवाला हूं. इस पर बुद्ध ने कहा, तुम अपना काम करो मैं अपना कर रहा हूं. कुछ समय डाकू ने उनका पीछा किया फिर उसने जीवन के सही मार्गदर्शन के लिए बुद्ध से विनंती की व उनका परम भक्त बन गया. मुदिता का अर्थ है कि हम किसी भी परिस्थिति में अपना संतुलन नहीं बिगाड़ेंगे. हर एक महापुरूष के चेहरे पर एक तेज झलकता है व परम सुख की किरने बिखरी होती है.

प्रश्न: उपेक्षा क्या है?

उत्तर: हर व्यक्ति अपने जीवन में सुख दुख दोनों देखता है. पर एक योगी के अनुसार दूसरों की बुराईंयों को अनदेखा कर लो व सिर्फ उनकी अच्छाईयों पर ध्यान दो. कहा जाता है कि जो जैसा होता है उसे वैसा ही दिखता है. ‘महाभारत’ की एक उदाहरण है- जहां दुर्योधन और युधिष्टर दोनों को उनके गुरू द्रोणाचार्य ने एक प्रश्न पुछा था, ‘जाकर देखों दुनिया में कितने बुरे लोग हैं? युधिष्टर गए और लौटक बोलें कि उन्हें एक भी बुरा आदमी नहीं मिला. सब लोग अच्छे थे. दुर्योधन गए और लौटकर बोले कि वाकई सब लोग बहुत बुरे हैं. यहां संभलकर सब लोगों से मिलना होगा. एक ही घटना को देखने का अपना अपना अलग दृष्टिकोण है.

जीवन में ऐसा ही होता है. अगर हम बुरा देखेंगे तो बुरा मिलेगा और अगर अच्छा देखेंगे तो अच्छा ही मिलेगा. इसलिए किसी ने सच ही कहा है हम अपनी दुनिया स्वय: बनाते हैं. अच्छी या बुरी. चुनना हमें ही है. इसलिए यह जरूरी है कि हम अपना जीवन यह चार परिकर्मा से परिपूर्ण कर लें कि हम हमेशा आनंद में ही रहे व औरों को भी आनंदमय बनाने में सहायता करें. इससे हम अपने जीवन कले उतार-चढ़ाव में स्वंय को संतुलित व संतोषमय स्थिति मे रख पाएंगे.

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