घर-परिवार – गर्भावस्था (भाग 1)

Posted on July 30 2013 by yogesh

प्रश्न: क्या मैं गर्भवती हूं?
उत्तर: जब एक स्त्री को एक महीने में मासिक धर्म नहीं होता तो वह सोचती है ‘क्या मुझे गर्भ ठहरा है?’ उसकी यह शंका एक लेडी डॉक्टर पेशाब की जांच व योनिमार्ग की जांच के बाद पूर्ण रूप से कह सकती है.

प्रश्न: गर्भवती महिला के मन में प्रश्नों का भंडार?
उत्तर: शारीरिक बदलाव: स्तनों में भारीपन होना, चूक का रंग और गहरा होना, गर्भाशय के बढ़ने से त्वचा का खिंचाव होना व खुजली होना, निशान पड़ना, चेहरे पर काले धब्बे दिखना. अपच होना, कब्ज का रहना. कभी कभी एसीडिटी होना, जी मिचलाना व उल्टी होना. यह सब साधारण चिन्ह हैं.
गर्भवती स्त्री का खुश रहना जरूरी है. तनाव मुक्त रहना भी उतना ही जरूरी है जितना समय पर खाना पीना व सोना.
कुछ असाधारण चिन्ह होते हैं जैसे बहुत ज्यादा उल्टी होना, योनिमार्ग से रक्त आना या रक्तचाप बढ़ना. ऐसी परिस्थिति होने से अपने डॉक्टर को संपर्क करना जरुरी है. गर्भवस्था कोई रोग नहीं है बल्कि एक स्त्री के जीवन का महत्वपूर्ण व सुखद अनुभव है.

श्वास में तकलीफ होना: जैसे जैसे गर्भवस्था बढती है वैसे वैसे गर्भ का श्वास पर असर पड़ता है. डायफ्राम ऊपर की तरफ जाना व उसका दबाव फेफड़ों पर होता है. इससे श्वास लेने में तकलीफ होती है. ऐसे समय ज्यादातर पेट से सांस लेना लाभदायक होता है. बढ़ते गर्भाशय का असर लिगामेंट पर पड़ता है जिससे उस पर खिंचाव महसूस होता है व इसी कारण दर्द महसूस होता है. इसमें घबराने की बात नहीं है. दर्द अपने से चला जाएगा. एक ही स्थिति में ज्यादा देर ना बैंठे. दर्द आते ही बैठने की स्थिति बदल लें. चिंता ना करें. यह एक सामान्य स्थिति है जो अपने से ठीक हो जाएगी.

प्रश्न: गर्भावस्था में व्यायाम का महत्व?   
उत्तर: एक स्वस्थ महिला बच्चा पैदा होने के समय और बाद में बहुत आसानी से अपनी देखरेख कर सकती है. योगशास्त्र के अनुसार शारीरिक व मानसिक स्वास्थ दोनों ही जरूरी हैं. योगशास्त्र एक मध्यम मार्ग अपनाता है. देखा गया है कि जिस महिला का ह्रद्य, फेफड़े व मांसपेशियां स्वस्थ हैं और श्वसन क्रिया सही है और वह अपने आप को शिथिल रख सकती है, उनकी डिलिवरी सरल होती है. इन मांसपेशियों का सही इस्तेमाल जानना जरूरी है.

शरीर के अंगों में काफी बदलाव आता है. गर्भाशय 10 गुणा बड़ा हो जाता है. आंते अपनी जगह से उठ जाती हैं. ह्रदय का कार्य बढ़ जाता है. हार्मोन में भी बहुत बदलाव आते हैं यानि के गर्भवती स्त्री में शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक बदलाव आते हैं. व्यायाम करने से गर्भवती महिला संतुलित रह सकती है. व्यायाम से गर्भावस्था में अधिकतर आप निरोगी रहते हैं, वह स्त्री के मन में एक आत्मविश्वास जगाता है. इस समय मेरूदण्ड को सीधा रखना बहुत जरूरी है. इससे पेट व कमर की मांस पेशियों को ताकत मिलती है.

ध्यान करनेवाले आसन जैसे सुखासन, पद्मासन, वज्रासन से योगासन की शुरूआत होनी चाहिए. यह शरीर और मन को संतुलित बनाए रखते है.
गर्भवती की 3 अवस्था है. पहले तीन महीने को फर्स्ट ट्रीमेस्टर कहते हैं. इस समय हॉर्मोन में बदलाव आते हैं-शारीरिक व मानसिक बदलाव. मितली व उल्टी होना, स्तनों में भारीपन आना, कभी कभी पेशाब भी जल्दी होता है. गर्भवती महिला को अपना ख्याल रखना चाहिए. सही व पौष्टिक भोजन करना चाहिए. इस समय गर्भपात की संभावना ज्यादा होती है.

दूसरे तीन महीने में होनेवाली मां को अपने बच्चे की हलचल का अहसास होने लगता है. अब गर्भावस्था में महिला तैयार हो जाती है. 5 महीने में बच्चे की ह्रदय की ध्वनि डॉक्टर को सुनाई देती है. बाहरी वातावरण का असर अंदर बच्चे को महसूस होता है. इसलिए तेज आवाज, लड़ाई वगैरह से दूर रहना चाहिए. इस वक्त बच्चे को मां द्वारा ज्ञान की बातें बतानी चाहिए. 6 महीने में बढ़ते गर्भाशय का जोर पेट पर पड़ता है व पाचन क्रिया असंतुलित हो जाती है. गर्भवास्था के आखरी तीन महीनों में पेट के ऊपर खिंचाव के निशान दिखने लगते हैं. पैरों में सूजन आने लगती है. वेरीकोज वेन्स भी हो सकता है. नियमित रूप से आसन करने से काफी हद तक यह तकलीफें कम हो सकती हैं. आठवे महीने में गर्भाशय बढ़कर ऊपर की तरफ दबाव देता है. कमर दर्द अक्सर बढ़ जाता है. श्वास में तकलीफ महसूस होती है. यहां पर सही आराम व सही पोश्चर से काफी मदद मिलती है. आखिरी कुछ हफ्ते बच्चे के लिए होते हैं. उसके जन्म की तैयारी हो रही है. नौवे महीने में बच्चे का सिर पोल्विक केविटी में आ जाता है. मां को श्वास लेने में एक हल्कापन महसूस होता है. यहां पर प्रसव क्रिया शुरू होती है. अनियमित मांसपेशियों के सिकुडन से प्रसव शुरू होता है जिसे बच्चे का सिर आगे की तरफ बढ़ता है.

आपको शिथिल होना चाहिए. शिथिलिकरण स्वस्थ है व तनाव अस्वस्थ है-ऐसा योग में कहा जाता है, गर्भवती महिला के लिए यह बहुत जरूरी है एक आरामदायक प्रसव के लिए व ब दमें स्वंय व बच्चे की देखरेख के लिए भी. यह एक मानसिक स्थिति है. कुछ योगासन इसमें मदद करते हैं जैसे-श्वासन, निष्पंदभाव.

गर्भवस्था के समय अपचन, छाती में जलन, उल्टी की शिकायत रहती है, उसके लिए हमें भिन्न बातों का ध्यान देना आवश्यक है.
-उल्टी व छाती की जलन कम करने के लिए तीन बार ज्यादा मात्रा में भोजन के स्थान पर थोड़ा थोड़ा भोजन दिन में कई बार खाएं.
- खाने के साथ पेय पदार्थ ना लें
- अधिक चिकनाई व मिर्च मसालेवाला भोजन मत लें
- भोजन जिसमें अधिक रेशे व चौकरवाला लेना चाहिए. कब्ज दूर करने के लिए अंजीर का फल बहुत लाभदायक है.

उल्टी:
गर्भावस्था के समय उल्टी की विशेष शिकायत रहती है. उसके लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान दें:
-    दिन में 5-6 बार थोड़ा थोड़ा खाएं
-    अगर भोजन पकाते समय उल्टी महसूस हो तो किसी और को भोजन पकाने दें या फिर ठंडा भोजन जैसे फल, दलिया, दही आदि खा सकती हैं.
-    खाने के तुरंत बाद मत लेटें
-    सुबह उठने पर या रात में बीच में उठे तो कुछ हल्का अन्न से बना क्रेकर आदि खाने के लिए अपने पास रखें.

यदि कठोर भोजन न पचे तो फलों ला रस, सोया मिल्क, पानी आदि का सेवन करें.
कब्ज: गर्भावस्था के समय हारमोन परिवर्तन के कारण व कैल्शियम व लोहतत्व खाने के कारण यह शिकायत हो जाती है. इसके लिए अधिक मात्रा में पेय पदार्थ लें, रोज पैदल चले. उसके साथ बेर, फल, किशमिश व सब्जिंयों का प्रयोग अधिक मात्रा में करें.
निम्नलिखित चार्ट में आपके लिए गर्भवस्था के समय केलरी व पौष्टिक भोजन की उचित मात्रा आवश्यकतानुसार दी गई है.

हरी सब्जी: किसी भी प्रकार के विटामिन या जड़ीबूटी य खान-पान में बदली करने से पहले अपने डॉक्टर की अनुमति अवश्य लेनी चाहिए. मां का दूध बढ़ाने के लिए कोई विशेष खाद्य पदार्थ नहीं है. किंतु अमुक ढंग उसमे सहायता कर सकते हैं. आप क्या खाते पीते हो वो इतना महतर्वपूर्ण नहीं है जितना कि बेबी क्या खाता पीता है वो ज्यादा महत्वपूर्ण है. सही ढंग से बेबी को छाती से लगाकर शांति से लंबे समय तक दूध पिलाते रहने से दूध उत्पादन की मात्रा अवश्य बढ़ती है. मां का दूध बढ़ाने का ये सबसे उत्तम इलाज है. खान पान एवं पोषक तत्व की दृष्टि से दूध की मात्रा बढ़ाने में दो बाते विशेष मायना रखती है. एक हो सके जितना, ज्यादा से ज्यादा प्रवारी लें. 20 से 40 औंस दूध बनता है व काफी माना जाता है. इसमें कमी हो सकती है. कमी के प्रमाण अनुसार उपाय करना चाहिए. प्यास मिटन के बाद भी थोड़ा और पानी अवश्य पीएं. बच्चे को दूध पिलाते वक्त, खुद भी धीरे धीरे पानी पीओ. ऐसा करने से दूध का उत्पादन नहीं बढ़ेगा किंतु आपके शरीर में प्रवारी कीमात्रा सही रहेगी.

दूध पिलानेवाली मां को एक दिन में सामान्य से अधिक 500 केलरी की आवश्यकता है. वजन कम करने के लिए या तो पतला बने रखने के उद्देश्य से मां अगर खुद कम खाती है तो उनकी दूध उत्पादन क्षमता कम हो जाती है और ज्यादा थकान महसूस होती है.
तनाव होने पर भी मां की दूध उत्पादन क्षमता कम हो जाती है. बीयर, शराब आदि पदार्थ तनाव घटाने या मिटाने का सही रास्ता नहीं है. सो यह मार्ग न लें.  दूसरा कोई सही उपाय ढुंढो.

वजन बढ़ने की मात्रा: यदि गर्भवती बनने के समय आपका वजह सही है और आप उससे खुश हैं तो 25 रतल(अंदाज 11 किलो) वजन बढ़ना योग्य माना जाता है. शुरूआत में यह सिर्फ 2 या 4 रतल(1 या 2 किलो) बढ़ेगा और धीरे धीरे बढ़ता जाएगा. ¾ रतल एक हफ्ते में बढ़ने की सीमा होनी चाहिए. यदि आपका वजन सही मात्रा में कम है(गर्भवती बनने के समय) तो 28 से 40 रतल वजन बढ़ना सही माना जाएगा. इतना तो बढ़ना ही चाहिए.
यदि गर्भधारण के समय, आपका वजन सही मात्रा से बहुत अधिक है तो वजन बढ़ने की मात्रा 15 से 25 तरल तक सीमित रखने का प्रयत्न अवश्य करें. पहले 14 सप्ताह में खाने-पीने की इच्छा न होने के कारण यदि वजन खास नहीं बढ़े तो ये चिंता का विषय नहीं है. उसके बाद कुदरत के नियमानुसार वजन बढ़ोत्री होती रहेगी.क्रमश:
अगले हफ्ते जानिए आहार के बारे में…

Powered By Indic IME