गरीबों के मुंह पर कांग्रेस ने मारा जोरदार चांटा

Posted on July 30 2013 by yogesh

नियोजन आयोग का ‘ अंधेर नगरी चौपट राजा’
गरीबों के मुंह पर कांग्रेस ने मारा जोरदार चांटा
अब इनकी चुनावी हार कोई नहीं रोक सकता है…


मुंबई(चंदन पवार):chandanpawar.pits@gmail.com

देश के गरीबों की मां बाप सरकार कही जानेवाली कांग्रेस सरकार अब की ‘सोनिया कांग्रेस’ शायद ‘इंदिरा कांग्रेस’ को भूल गई है क्योंकि गरीबों की कद्र करनेवाली उनके लिए घर और रोटी का इंतजाम करनेवाली इंदिरा गांधी सरकार ने गरीबों के मन को जीत लिया था. गरीबों के यही प्यार की संपत्ति को सोनिया सरकार के मंत्रियों ने दिन दहाड़े लूट लिया है और इस सरकार के मंत्री बारी बारी से जनता की इज्जत को उछाल उछाल कर आनंद ले रहे हैं. सरकार ने गरीबो के लिए जो व्याख्या की है उसे देख गरीब और मर गया है. नियोजन आयोग के इतने बड़े ओहदे पर बैठे सरकार के अंधे अफसरों को यह दिखाई नहीं दे रहा है कि एक वक्त की रोटी के लिए एक गरीब अपना दिन किस कठिनाई से गुजारता है.

गरीबों की थाली की कीमत लगानेवालों में सबसे आगे हैं यूपीए सरकार के राज बब्बर ने कहा कि मुंबई में सिर्फ 12 रूपये में खाना मिलता है. अगर यह सच में मुंबई के सड़कों पर घूमते और लोगों का दुख देखते तो उन्होंने जो 12 रूपये में खाना मिलने की बात कही है वह कभी नहीं करते क्योंकि आज मुंबई में वड़ापाव की कीमत 12 रूपये है जिसमें एक वड़ा और एक पाव मिलता है. वहीं मुंबई में रहनेवाले राज बब्बर को क्या यह भी नहीं पता कि आज कई सरकारी दफ्तरों में सब्सिडी की दर पर मिलनेवाले खाने की कीमत भी 20 से 25 रूपये के बीच में है उस पर एक सामान्य आदमी को 12 रूपये में कौन खाना देगा? अगर एक परिवार में चार सदस्य हैं तो इस हिसाब से 48 रूपये एक वक्त के सिर्फ वड़ा पाव खाने में खर्च हो जाते हैं तो राज बब्बर साहब ने मुंबई के कौन से इलाके में जाकर 12 रूपये में खाना मिलनेवाली जगह को खोज निकाला है, यह जरा बताएं. और अगर इनकी बातों को सच भी मान लेते हैं तो 12 रूपये का खाना अगर मुंबई के बोरीवली में मिलता है तो चर्चगेट में रहनेवाला गरीब आदमी 15 रूपये खर्च करके बोरीवली में खाना खाने जाएगा? इसलिए इन जैसे लोकप्रतिनिधियों को अपने पद की गरिमा का ख्याल रखते हुए बयानबाजी करनी चाहिए. क्योंकि इस तरह के डायलॉग सिर्फ फिल्मों में अच्छे लगते हैं. भले ही इन्होंने अब माफी मांग ली हो परंतु एक बार धनुष से तीर छूट जाने के बाद उसे वापस नहीं लिया जा सकता है.

इस विषय में हद तब हो गई जब कांग्रेस के दो लोकप्रतिनिधि रशीद मसूद ने पांच रूपये और केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला ने एक रूपये में भरपेट खाना मिलने की बात कही है. फारूक अबदुला को यह बात 60 साल पहले कहनी थी लेकिन शायद उनको अब याद आया हो? क्योंकि एक रूपये को बहुत साल पहले ज्यादा माना जाता था और उससे उस समय खाना मिल भी जाता होगा परंतु आज एक रूपये में एक चॉकलेट भी मुश्किल से मिलती है तो इस तरह की बयानबाजी करनेवालों को अगर दिन में 34 रूपये दिए जाए तो क्या वह उनके लिए बहुत है? क्यों यह लोग गरीबों का मजाक उड़ान में लगे हैं. फाइव स्टार रहन सहन, नौकर चाकर, बंगला गाड़ी और ऐशो आराम की जिंदगी बसर करनेवालों को गरीब लोग अपनी पूरी जिंदगी किस तरह मर मर के जीते है यह इनको मालूम भी है.

देश के प्रधानमंत्री एक अर्थशास्त्री और नियोजन आयोग के अध्यक्ष हैं उन्होंने ही गांव में रहनेवाले आदमी को 27 रूपये और शहर में रहनेवालों को 34 रूपये दिन में खर्च करने के लिए बहुत होते हैं, इस तरह का संशोधन किया है और यह निर्णय लेकर यहां पर ही नहीं रूके आगे जाकर उन्होंने कहा कि देश में सात सालों में 15% गरीबी कम हुई है और अब देश में सिर्फ 21.92% गरीब बचे है. इस तरह की बीना प्लैनिंग किए और सर्वे ना करते हुए बनाई सोच को उन्होंने गरीब जनता के सामने जाहिर तो कर दी मगर यह निर्णय उन्होंने किस आधार पर बनाया यह संशोधन का विषय है. जब नियोजन आयोग अपने टॉयलेट पर जनता के 35 लाख खर्च कर सकती है और एक नेता के एक बार के खाने पर 7200 रूपये खर्च करनेवाले नियोजन आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया को अपने पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है. ऐसी आवाज लोगों से उठनी शुरू हो गई है. इस पद पर ऐसे आदमी की नियुक्ति होनी चाहिए जो गरीबों का दुख जानता हो, उनकी तकलीफों से वाकिफ हो और एक अच्छा तर्कशास्त्री हो क्योंकि आज की महंगाई के दौर में 27 और 34 रूपये में क्या होनेवाला है, यह तर्क होना चाहिए. हाथी पर बैठकर भेड़ बकरीयां नहीं हाकी जाती हैं जो इस तरह का काम आज नियोजन आयोग कर रहा है. इनके ही कमेटी के सदस्य डॉ.नरेंद्र जाधव ने इस निर्णय को गलत ठहराया है, यह बात बहुत महत्वपूर्ण है.

इससे एक बात का अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है कि यह सरकार को गरीबी नहीं बल्कि गरीबों को हटाना चाहती है क्योंकि आज पूरे देश में कुपोषण और भूखमरी से लोगों की मौत हो रही है. अगर यह सरकार इसी तरह गरीबों की कीमत लगाता रहा तो भविष्य में गरीब और गरीब होता जाएगा और वह एक दिन अपने पूरे परिवार समेत आत्महत्या का मार्ग स्वीकार करेगा जिससे देश से गरीबों की संख्या कम होती जाएगी. शायद यही इस सरकार का मकसद है? लेकिन सरकार किसके बलबूते पर बनती है शायद यह नशे में धुत और संसद जैसी महान वास्तु पर पॉर्न वीडियो देखनेवाले कुछ लोकप्रतिनिधि भूल गए हैं लेकिन जनता आनेवाले 2014 के चुनाव मे जरूर उनको याद दिला देगी. बस अब सिर्फ इंतजार है जनता के जागने का इसलिए जागो जनता जागो, आपके सर के ऊपर पानी आ गया है.

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