हेल्थ टिप्स – अड़ूसा ( वनस्पतियों में अमृत )

Posted on May 27 2013 by yogesh

अड़ूसा एक अमृत समान औषधि है। इसका उपयोग विभिन्न रोगों को दूर करने में किया जाता है। इसका उपयोग करने के बाद इसका असर जल्दी होता है। यह वातकारक, स्वशोधक, कड़वी, कसैली, हृदय हितकारी, हल्की, शीतल और कफ, पित्त, रक्त विकार, प्यास, श्वास, खांसी, ज्वर, वमन, प्रमेह तथा क्षय का नाश करने वाली वन औषधि है।

विभिन्न भाषाओं में इसके नाम हैं जैस संस्कृत में वासक, हिन्दी में वासा अड़ूसा, मराठी में अडुलसा, गुजराती में अरडुसो, बंगाली में वासक। कन्नड़ में शोगा, शोडी मलट, तेलुगू में आदासरा, तमिल में एधाडड। इंगलिश में मलाबार नट और लैटिन में इसे अधाटोडा वासिका कहा जाता है।

इसके झाड़ीदार पौधे 4 से 8 फीट तक ऊंचे होते हैं और भारत के हर प्रदेश में पैदा होते हैं। इसके पत्ते लम्बे और अमरूद के पत्तों जैसे होते हैं। यह काला और सफेद दो प्रकार का होता है। फरवरी-मार्च में इसमें फूल लगते हैं। यह गांव के बाहर खेतों के पास, बाग-बगीचों के किनारे झुंड के रूप में उत्पन्न होता है। इसे बागवान, कृषक और बुजुर्ग लोग जानते-पहचानते हैं। इसके सूखे पत्ते कच्ची जड़ी-बूटी बेचने वाली दुकान से खरीदे जा सकते हैं।

अड़ूसा के उपयोग
इसका उपयोग कफ  प्रकोप और खांसी की चिकित्सा में किया जाता है। इससे बने आयुर्वेदिक योग वासावलेह, वासरिष्ट, वासाचन्दनादि तेल बाजार में मिलते हैं। इसके ताजे पत्तों का रस निकालकर अथवा सूखे पत्तों को पानी में उबालकर काढ़ा बना कर उपयोग में लाया जाता है।

अड़ूसा के घरेलू उपयोग
कफ  प्रकोप एवं खांसी में यह काफी कारगर है। इसके ताजे पत्ते मिल सकें तो उनका रस निकाल लें। एक चम्मच रस और एक चम्मच शहद मिलाकर सुबह, दोपहर और शाम को चाटने से कफ  पिघल कर ढीला हो जाता है और आसानी से निकल जाता है, जिससे कफ  प्रकोप शान्त होता है और खांसी में आराम मिलता है।

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