सप्ताह की खास मुलाकात – नीला सत्यनारायण ( राज्य चुनाव आयुक्त, महाराष्ट्र राज्य )

Posted on November 26 2012 by yogesh

मैं कवयित्रि होने के कारण आम जनता से जुड़ी हुई हूं

कहते हैं एक महिला के अनेक रूप होते हैं और ऐसी ही एक महिला जिन्होने महाराष्ट्र में कलेक्टर पद से लेकर विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है और साथ ही एक प्रसिद्ध कवयित्रि और लेखिका भी हैं. इन सभी जिम्मेदारियों को कुशलतापूर्वक निभाते हुए आज वह महाराष्ट्र की पहली महिला राज्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यरत है. इनसे हमारे संवाददाता गौतम कोरडे की खास मुलाकात.

आपको २००९ में पहली महिला निर्वाचन आयुक्त बनने का मौका मिला. कैसा लगता है पहली महिला के रूप में इस बड़े पद पर काम करते हुए?

एक बड़ा क्षेत्र जहां पुरूषों का वर्चस्व होता है वहां अगर महिला पहुंच जाती है तो प्रशासन में बहुत अंतर आता है. पुरूष और महिला का प्रशासन के लिए काम करने के तरीके में बहुत फर्क होता है. महिलाएं भी प्रशासन अच्छे तरीके से चला सकती हैं लेकिन उनके साथ भावनाओं का एक बड़ा जुड़ाव होता है. इसलिए जब किसी क्षेत्र में जहां केवल पुरूष ही काम करते थे वहां महिलाओं का प्रवेश होता है तो उसे पहली महिला अधिकारी होने का नाम दिया जाता है और मेरा सौभाग्य रहा है कि मैं बहुत से विभागों में पहली महिला के रूप में काम कर चुकी हूं.

पहली महिला चुनाव आयुक्त बनने के बाद आपके मन की क्या स्थिति थी इस पद को संभालने के बारे में, कभी इस पद को लेकर आप पर दबाव बना?

सरकार से रिटायरमेंट लेने के बाद मैं आराम कर रही थी अचानक ही पूर्व मुख्यमंत्री जी का मुझे फोन आया और मैं जब उनसे मिलने गई तो मैं यह ठान कर गई थी कि अब मैं सरकार में काम नहीं करूंगी क्योंकि उस वक्त मैं परिवारिक भूमिका निभाना चाहती थी लेकिन अशोक चव्हाण जी ने मुझे बताया कि उन्होने मुझे इंटरविव के लिए बुलाया है. उस वक्त १६ लोगों ने अर्जी भरी थी लेकिन उन्होने मुझे सम्मान देते हुए कहा कि हम सिर्फ आपकी हां सुनना चाहते हैं और यह बात मेरे दिल को छू गई. उन्होने मुझे बताया कि जिससे भी उन्होने सलाह मशवरा किया उनके सामने सिर्फ मेरा नाम ही आया. मैं उनके दिए हुए सम्मान को इंकार नहीं कर सकी. मुझे शुरू में इस काम का अनुभव नहीं था लेकिन जैसे जैसे मैने काम करना शुरू किया मुझे समझ में आया कि कितनी कांटों और मुश्किलों भरी राह है जिस पर मैंने एक किताब भी लिखी है. बहुत से लोगों को यह नहीं पता होता कि एक चुनाव आयुक्त का काम क्या होता है इसलिए ‘काठीचा घाव’ किताब में मैंन यह जानकारी भी दी है.

चुनाव आयुक्त के पद पर काम करते हुए आपको किन किन कठिनाईयों का सामना करना पड़ा?

ऐसे तो बहुत सी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है लेकिन कभी कभी ऐसा होता है कि चुनाव एक दो दिन में हैं और ऐसे में सहयोगी कर्मचारी बगावत कर देते हैं कि हम काम नहीं करेंगे, यह एक बहुत बड़ी चुनौति है. दूसरी बड़ी चुनौति यह है कि अंतिम समय में सरकार की ओर से ऐसे आदेश आ जाते हैं जो मेल नहीं खाते, तो दिक्कत बढ़ जाती है. इस पद की यह विशेषता है कि दिल्ली में भी आप देखेंगे कि चुनाव आयुक्त के साथ दो अन्य आयुक्त भी होते हैं जो उनकी सहायता करते हैं. लेकिन यहां ऐसा कोई नहीं है इसलिए मुझे हमेशा ऐसा लगता है हिमालय की चोटी पर मैं अकेले बैठी हूं. कभी कभी इलेक्टोरल मशीन बंद हो जाते हैं तो ऐसी बहुत सी समस्याएं आती हैं. इस पद पर रहते हुए आपसे गलती होने की उम्मीद नहीं रहती है इसलिए इस पद पर रहते हुए आपकी जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है.

आप चुनाव आयुक्त होने के बावजूद कविताएं, लेख या पुस्तक लिखती हैं, वक्त मिलता है?

कवि मैं बहुत पहले से थी और प्रशासकीय अधिकारी बहुत बाद में बनी. मैं अपने उम्र के ७वें साल से कविताएं लिखते आ रही हूं और कई पुरस्कार भी जीते हैं. मैं जानती हूं यह मेरे आत्मा के अंदर एक ज्योति की तरह है जिसे मैं बुझने नहीं देना चाहती और इसी के वजह से मेरे पैर जमीन पर हैं. कविताओ की वजह से मैं आम जनता से जुड़ी हुई हूं यदि मैं केवल प्रशासकीय अधिकारी होती तो शायद मेरा काम करने का तरीका अलग होता.

आपको लगता है कि ५० प्रतिशत महिला आरक्षण होने के बाद महिलाओं की स्तिथि में सुधार आएगी?

जब तक महिला खुद प्रशासन में नहीं आएगी या खुद पहल नहीं करेगी तब तक बदलाव होना मुमकिन नही है.

चुनाव के मौसम में अक्सर पैसे बाटने और भ्रष्टाचार होने के आरोप लगते रहे हैं उसे रोकने के लिए किस प्रकार के सक्षम कदम उठाए जा रहे हैं?

मैं यह सोचती हूं कि कोई अकेली सरकार इसे नहीं रोक पाएगी. अक्सर ऐसा सुनने में आता है कि उम्मीदवार पैसा और शराब बांटते हैं लेकिन मैने काम करते हुए देखा है कि लोग ही लालची हो गए हैं. वह भी पैसे मांगते हैं. कहीं ना कहीं लोगों में यह जिम्मेदारी आनी चाहिए कि हमें साफ सुथरी व्यवस्था चाहिए तो हमें भी स्वच्छ रहना पड़ेगा.

इतने व्यस्त दिनचर्या के बावजूद एक विकलांग बच्चे की मां होने की जिम्मेदारी को आपने कैसे निभाया?

सबसे पहले तो मैं टूट गई थी कि हमें करना क्या है? लोगों को अक्सर नहीं समझाया जाता, उन्हे सही मार्गदर्शन नहीं मिलता है कि यदि उनका बच्चा विकलांग होता है तो उनका पालन पोषण कैसे करना चाहिए? डॉक्टरों का भी यही कहना था कि ज्यादा सुधार नहीं हो रहा है. मैने सोचा कि एक औरत के रूप में मैं असहाय हूं लेकिन एक मां कभी असहाय नहीं होती. उन दिनों गणपति पूजा हो रही थी. मैने सोचा कि हम गणपति की पूजा करते हैं जिन्हे पार्वती जी ने अपने शरीर से बनाया था और हर औरत के अंदर एक पार्वती होती है. क्योंकि मैं नीला सत्यनारायण होने के साथ साथ एक मां हूं और एक मां से ज्यादा सामर्थ्य किसी में नहीं होता. एक मां में इतनी ताकत होती है कि वह अपने बच्चे का पालन-पोषण कर सके. मैने सोचा कि मैं अपने बच्चे को इस काबिल बनाऊंगी कि वह किसी पर निर्भर ना रहे. फिर मैंने चीजों को साकारात्मक रूप में लेना शुरू किया. इस तरह के बच्चों को आपको अलग तरीके से व्यवहार करने की जरूरत नहीं होती जैसे आप एक समान्य बच्चे से बात करते हैं वैसे ही उनसे भी करें तो सब ठीक होता है.

विकलांग बच्चों के अभिभावकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?

सबसे पहले तो उन्हें यह बात स्वीकारनी चाहिए कि अपना बच्चा समान्य नहीं है. दूसरी बात अपने बच्चे की तूलना किसी अन्य बच्चे से ना करें. आप यह देखें कि आपका बच्चा अपने आप में अनोखा है तो आप यह देखें कि आप उन्हें कैसे काबिल बनाएंगे और उसके अंदर ऐसा कौन सा गुण है जिसे आप बढ़ावा दे सकते हैं और वह सक्षम हो सके.

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