इंसाफ मिल ही गया

Posted on November 26 2012 by yogesh

कसाब के लिए रात भयंकर और सुबह काली
ऑपरेशन ‘X’ फतह
अब देश के लोगों को अफज़ल गुरू के फांसी का इंतज़ार

मुंबई(चंदन पवार)Email:chandanpawar@gmail.com

मुंबई हमलों के एकमात्र जीवित हमलावर अजमल आमिर कसाब के लिए गत बुधवार की रात बहुत ही भयंकर रही और सुबह काली. क्योंकि २६/११ हमले के फिदायीन आतंकवादी अजमल आमिर कसाब को बुधवार सुबह ७.३६ बजे पुणे के येरवडा जेल में फांसी दे दी गई, जिसके बाद डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. पाकिस्तान द्वारा कसाब का शव लेने से इंकार करने पर उसे जेल में ही दफना दिया गया. महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर.आर.पाटिल ने कसाब को फांसी दिए जाने की पुष्टि की है. इसके बाद केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी कसाब को फांसी दिए जाने की जानकारी दी. कसाब को फांसी दिए जाने के बाद जेल प्रशासन ने राज्य के गृह सचिव को भी इसकी सूचना दी. इस पूरे ऑपरेशन को ‘ऑपरेशन एक्स’ का नाम दिया गया था.   

आपको बता दें कि ऑपरेशन एक्स को बहुत ही गोपनीय तरीके से अंजाम दिया गया. सबसे पहले गोपनीय तरीके से कसाब को मुंबई की आर्थर रोड जेल से पुणे की येरवडा जेल ले जाया गया और इस ऑपरेशन को अंजाम तक पहुंचाने में बहुत ही कम अफ़सर शामिल थे. इस ऑपरेशन की किसी को भनक ना लग जाए इसलिए इसे अत्यंत ही गुप्त रखा गया और यह ऑपरेशन सफल रहा.

येरवडा की जिस सेल में कसाब को रखा गया था वहां तक सभी अधिकारियों की पहुंच नहीं थी. बताया जा रहा है कि कसाब तक केवल दो ही अधिकारी पहुंच सकते थे. इस घटना की खबर किसी को कानों काम नहीं हुई. लेकिन बताया जा रहा है कि सबकुछ योजना के अनुसार ही हुआ. फांसी का समय और तारीख दोनों तय थी. कसाब को भी इस बात की जानकारी थी कि उसे फांसी दी जानेवाली है. कसाब को बता दिया गया था कि राष्ट्रपति ने उसकी दया याचिका खारिज कर दी है. उसकी ओर से खुद को बचाने के लिए की गई सभी कोशिशें पूरी हो चुकी थीं. १९ नवंबर को कसाब के डेथ वॉरेंट पर हस्ताक्षर कराए गए. बुधवार सुबह तक कसाब को फांसी दिए जाने की सारी औपचारिकताएं पुरी करा ली गई थीं. समाचार एजेंसी पीटीआई की खबर के अनुसार जब कसाब से उसकी आखरी इच्छा पूछी गई तो उसने कहा कि,’मेरे मौत की खबर मेरे अम्मी तक पहुंचा देना.’

सुबह सवा सात बजे जेल के अधिकारी कसाब को लेने गए तो कसाब ने उन्हें देखते सलाम किया और फांसी पर चढ़ाए जाने के पहले येरवडा जेल के प्रमुख मेडिकल ऑफिसर ने कसाब की जांच की और वह उस वक्त मुस्कुरा रहा था.

खबरों के अनुसार फांसी से ठीक पहले कसाब अपने गुनाह पर शर्मिंदा था. येरवडा जेल के एक अधिकारी के अनुसार कसाब फांसी दिए जाने कुछ समय पहले तक बहुत घबराया हुआ था लेकिन शांत था और मरने से पहले उसने नमाज भी पढ़ी थी. कसाब जब फांसी के तख्ते पर खड़ा था तब उसे यह कहते हुए सुना गया कि, अल्लाह कसम, अल्लाह कसम ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी. अल्लाह माफ करे मुझे.’ इसके बाद कसाब को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया. इस पूरी प्रक्रिया में सात आठ मिनट लगे और ऑपरेशन एक्स पूरा हो गया. कसाब को फांसी लगने के बाद महाराष्ट्र के गृहमंत्री को सुचिता किया गया को ऑपरेशन एक्स सफल रहा. इसके आधे घंटे के बाद ही कसाब को जेल के परिसर में दफना दिया गया.

कसाब को फांसी दिए जाने की पूरी प्रक्रिया को जिस तरह से गुप्त रखा गया उस तरह से पहले कभी नहीं हुआ है. कहा जा रहा है कि कसाब को फांसी दिए जाने की जानकारी प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के मंत्रीमंडल के किसी सदस्य को नहीं थी ना सोनिया गांधी को. फिलहाल गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा है कि कसाब को मुंबई से पुणे ले जाने और उसे फांसी पर चढ़ाए जाने की शूटिंग की गई है.

कसाब की फांसी पर उठ रहे हैं प्रश्न

बहुत सारे प्रश्नों में एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या अजमल कसाब को क्या सिर्फ इसलिए फांसी दे दी गई थी क्योंकि उससे संबंधित सभी औपचारिकताएं पुरी हो चुकी थीं? यदि ऐसा है तो अफजल गुरू को अब तक फांसी क्यों नहीं दी गई. २००१ में देश के संविधान पर हमला करनेवाले अफजल गुरू को २००५ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है. फिर उसके फांसी में इतनी देरी क्यों? नवभारत टाईम्स समाचार पत्र के अनुसार यदि मुंबई क्राइम ब्रांच के एक अधिकारी के दावे पर ध्यान दें तो उनका कहना है कि यदि कसाब को फौरन फांसी ना दी जाती तो वह तीन महिने के अंदर अपने प्राकृतिक मौत से मर जाता. उसकी तबियत बहुत खराब चल रही थी. इस अधिकारी के मुताबिक यदि ऐसा हो जाता तो सरकार की खूब किरकिरी होती इससे बचने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया है. ऐसा भी कहा गया था कि कसाब को डेंगु हो गया था लेकिन हकीकत में यह उसका एक रूटीन मेडिकल चेकअप था.

यह भी जल्द लटक सकते हैं सुली पर…

पांच नवंबर को ही राष्ट्रपति ने अजमल कसाब की दया याचिका खारिज की थी जिसे पिछले महीने गृह मंत्रालय ने ठुकराकर अपनी सिफारिश भेजी थी. गौरतलब है कि राष्ट्रपति कार्यालय के अनुसार राष्ट्रपति के पास इस समय कुल १६ लोगों के फांसी के १६ मामलों की दया याचिकाएं हैं जिनपर फैसला होना अभी बाकी है.

मोहम्मद अफज़ल गुरू: इस पर भारत की संसद पर हमले में शामिल होने का दोष है. इसमें ९ लोग मारे गए थे और १६ लोग घायल हुए थे. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ४ अगस्त २००५ को फांसी की सजा सुनाई थी. पिछले साल अगस्त में केंद्रीय गृह मंत्री ने उसकी दया की अर्जी खारिज करते हुए अपनी सिफारिश राष्ट्रपति को भेज दी थी. अब राष्ट्रपति ने फिर से उसे गृह मंत्रालय के पास पुन: विचार के लिए भेज दिया है.

सोनिया और संजीव: इन दो शख्स ने संपत्ति के लिए अपने ही परिवार के आठ लोगों को मौतदे दी थी जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने साल २००७ में इन्हें फांसी की सजा सुनाई थी. इसी साल इनकी दया याचिका को गृह मंत्रालय ने खारिज किया है.

गुरमीत सिंह: अपने परिवार के १३ लोगों को मौत के घाट उतारने के जुर्म में सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें साल २००५ में फांसी की सजा सुनाई थी. साल २००९ में गृह मंत्रालय ने इनकी दया याचिका को खारिज कर दिया था.

धर्मपाल: धर्मपाल की दया याचिका अब तक राष्ट्रपति के पास पहुंचे दया याचिकाओं में से सबसे पुरानी है. इन्होने एक परिवार के पांच लोगों का खून किया था जब यह किसी अन्य बलात्कार के मामले में जमानत पर जेल से बाहर थे.

गणाप्रकाश, साइमन, मदाएं और बिलवांद्र: इन पर कर्नाटक के २२ पुलिस कर्मियों को एक लैंडलाइन धमाके में मारने का दोषी पाया गया था. साल २००४ में इन्हें सुप्रीम कोर्ट द्वारा फांसी की सजा सुनाई गई थी. लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पिछले ही साल मई के महीने में फैसला कर राष्ट्रपति के पास भेज दिया था.

सुरेश और रामजी: साल २००१ में संपत्ति के लिए अपने पांच रिश्तेदारों को कत्ल करने के मामले में यह दोनों ही दोषी पाए गए थे. पिछले साल फरवरी में इनकी दया याचिका को गृह मंत्रालय ने राष्ट्रपति के पास भेजा था.

प्रवीण कुमार: साल २००३ में एक परिवार के चार लोगों के कत्ल के मामले में प्रवीण कुमार को दोषी पाया गया था. पिछले साल गृह मंत्रालय ने इनकी दया याचिका को खारिज कर राष्ट्रपति के पास भेज दिया था.

सईबन्ना निंगप्पा नाटिकर: २००४ में इन्हें अपनी ही पत्नी व बेटी के खून करने का दोषी पाया गया था. पिछले साल सितंबर से इनकी अर्जी राष्ट्रपति के पास है.

 जफर अली: अपनी पत्नी के अलावा इन्हें साल २००४ में अपनी पांच बेटियों के कत्ल करने का भी दोषी पाया गया था. इनकी दया याचिका की फाईल राष्ट्रपति के पास नवंबर २०११ में पहुंची.

सुंदर सिंह: साल २०१० में अपने भाई के परिवार के पांच सदस्यों की हत्या के इल्जाम में दोषी करार दिया गया था. इनकी दया याचिका इस साल फरवरी में गृह मंत्रालय ने खारिज कर राष्ट्रपति के पास भेज दिया है.

अतबीर: अतबीर ने अपने सौतेले भाई, मां और बहन का कत्ल किया था और पिछले पांच महीने से इनकी दया याचिका राष्ट्रपति के पास पहुंची है.

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