विकलांग बस्ती की व्यथा…

Posted on October 29 2012 by yogesh

विकलांगों को मानवता का आभास करवाओं!
 
विकलांग बस्ती की व्यथा…

मुंबई (गौतम कोरडे): पूंजीपति मुंबई जैसे महानगर के बगल में ही मीरा-भायंदर जैसा शहर है. इसी मीरा रोड में पिछले १४ सालों से ‘जय मुंबई विकलांग(अपंग)पुनर्वसन संस्था’ है. इस संस्था से ५० विकलांग परिवार जुड़े हुए है जो डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर नगर, डोंगरी जैसी झुग्गी झोपड़ी में रहते हैं. इस झुग्गी झोपड़ी में आजतक स्थानीय प्रशासन, और केंद्रीय प्रशासन ने आजतक कोई भी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई हैं. इस बस्ती में कई विकलांग ऐसे है जो अपने रोजी रोटी के लिए छोटा मोटा काम करने के साथ मन से ना चाहते हुए भी कुछ लोगों को भीख मांगकर अपना गुजारा करना पड़ता है. इन विकलांगों ने अपनी समस्याओं के बारे में स्थानीय विधायक, सांसद और पालक मंत्री तक गुहार लगाई है. फिर भी इन राजनेताओं ने आजतक इनको अपने मूलभूत अधिकार प्राप्त नहीं करवाए.

इसके अलावा मीरा-भायंदर महानगरपालिका के आयुक्त विक्रम कुमार जी के सामने भी इन विकलांग परिवारों ने अपने मूलभूत अधिकारों जैसे पानी, बिजली, शौचालय और बेरोजगार विकलांगों के लिए टेलिफोन बुथ के नदारद होने की खबर की है लेकिन अभी तक प्रशासन की ओर से इन्हे कोई भी सुविधा मुहैय्या नहीं कराई गई है. राज्य सरकार द्वारा बनाए गए १९९५ कानून के अनुसार हर विकलांग व्यक्ति को रोजगार एवं रहने के लिए सवा दौ सौ स्क्वैयर फिट की जगह देने का उल्लेख किया गया है. लेकिन आजतक राज्य सरकार तथा स्थानीय महानगरपालिका ने इस सुविधा को उपलब्ध नहीं कराया है. यह विकलांग लोग उस गंदी बस्ती में एक नर्क समान जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर है.

एक सामान्य व्यक्ति सोचने पर भी इन बस्ती मे रहनेवाले विकलांगों के दर्द को नहीं समझ पाता. सामान्य जीवन व्यतीत करने के लिए जिन चीजों की जरूरत पड़ती है उनके ना होने से इन लोगों को काफी दिक्कत का सामना करना पड़ता है. विकलांगों के बच्चों को बिजली ना होने की वजह से पढ़ाई मे काफी दिक्कत होती है. विकलांग महिलाओं को शौचालय की व्यवस्था ना होने से काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. साथ ही बस्ती में पानी ना होने के कारण इन विकलांग लोगों को काफी दूर से पानी लाना पड़ता है जो इनके लिए काफी मुश्किल भरा काम है. प्रगतिशील महाराष्ट्र में विकलांगों का इस तरह का नर्कीय जीवन अपने आप में शर्मींदा कर देनेवाला है. बड़े बड़े पार्टियों के बड़े बड़े नेताओं ने इन विकलांग परिवारों से सहानुभूति तो बहुत दिखाई है लेकिन इनके दुख को कम करने का कभी प्रयास नहीं किया. इन नेताओं और सरकारी बाबुओं के बंगल में जलतरण तलाब बने रहते हैं जिसके हजारो लीटर पानी में यह स्नान करते हैं वहीं इन लोगों को पीने के दो बूंद पानी के लिए काफी तरसना पड़ रहा है. यह कैसी है मानवता.

१९९८ से यह एक साथ झुग्गी झोपड़ी बनाकर रहते हैं जिसका रुपांतरण उन्होने २००० में ‘जय मुंबई विकलांग(अपंग)पुनर्वसन संस्था’ के रूप में किया और अपने हक के लिए मांग करते रहे जो आजतक उन्हे दी नहीं गई है. इस संस्था के द्वारा कलेक्टर कार्यालय और मंत्रालय तक मोर्चे निकाले गए हैं लेकिन प्रशासन के कान पर जूं तक नहीं रेंगती और वह इस विकलांग बस्ती की ओर से उदासीन ही बना रहा है. इसी प्रयास में फिर से एक बार गत २२ अक्टूबर को सुबह ११ बजे विकलांग परिवारों द्वारा मोर्चा निकाला गया. संस्था के अध्यक्ष इमरान मुल्ला और सचिव गौरव खेरेनार साथ ही महिला अध्यक्ष स्वर्णा प्रेमलाल के नेतृत्व में इस मोर्चा का आयोजन किया गया था. उस मोर्चे में वहीं मांगे थी जो यह लोग पिछले १४ सालों से कर रहे हैं. इन विकलांगों की मांगों को मीरा-भायंदर के उपायुक्त विलास धगे ने बड़े गहराई से सुना और उन विकलांग संस्था के सदस्य को उन्होने वचन दिया है कि जो जीवनाश्यक सुविधाएं जैसे पानी और शौचालय की सुविधा जल्द से जल्द बस्ती तक पहुंचेंगी.

अब देखना यह है कि विलास धगे साहब ने इस विकलांग लोगों को जो आश्वासन दिए हैं उनको कब तक पूरा करते हैं?

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