आरटीआई कानून की धज्जियां…

Posted on October 29 2012 by yogesh

मालेगांव के २ उपविभागीय अधिकारी और २ तहसीलदारों ने अपने कर्तव्यों से भटके एक तलाठी को बचाया…

पिंपलगांव(मालेगांव) के किसान डेढ़ साल से न्याय की प्रतिक्षा में…

मुंबई(चंदन पवार)Email: chandanpawar.pits@gmail.com

भारत देश जबसे आजाद हुआ है तबसे हमने लोकतंत्र का स्वीकार किया है और आज तक देश की जनता यह अनुभव कर रही थी. परंतु क्या इस लोकतंत्र का आज लोगों को अच्छा अनुभव मिल रहा है? पहले से ही राजनेताओं के दहशत में जी रहे लोगों को अब उच्च अधिकारियों के दहशत में जीना पड़ रहा है और यह घटना स्वतंत्र भारत के २१वीं सदी में जा रहे देश में हो रही है. इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है और एक गांव, तलाठी, तहसीलदार और उपविभागीय अधिकारी से न्याय की गुहार कर रहा है.

जी हां, यह सच्ची घटना है नाशिक जिले के मालेगांव तालुके के पिंपलगांव की. यहां के किसानों के बारे में जानकर आपको हैरानी होगी कि कैसे यह उच्च अधिकारी अपने पद का गलत इस्तेमाल करके गरीब किसानों को मुर्ख बनाते हैं. इनके दुख के जिम्मेदार गांव के तलाठी रह चुके पी.डी.परांडकर ने इनकी दुखभरी कहानी की शुरूआत की है और इनको साथ देनेवाले तहसीलदार एस.एम.आवळकंठे और बी.डी.डोईफोडे, उपविभागीय अधिकारी अजय मोरे और उदय किसवे हैं.

आरटीआई कानून जब से देश में आया है तब से बड़े बड़ों की भ्रष्टाचार की कुडलियां बाहर आ रही है. इस कानून की वजह से देश में चल रहे घोटालों का पर्दाफाश हो रहा है जिसकी वजह से कुछ सरकारी अधिकारियों और कुछ भ्रष्ट नेताओं पर दबाव बन गया है. परंतु मालेगांव तालुके के तहसीलदार और उपविभागीय अधिकारियों ने आरटीआई कानून की सिर्फ धज्जियां ही नहीं उड़ाई बल्कि उसे तोड़ मरोड़कर उसकी चेष्टा भी की है. यह अधिकारी यह कृत्य इसलिए कर चुके हैं क्योंकि इनको किसी का भी डर नहीं है. जब महाराष्ट्र में १५ नवंबर २०१० को बेमौसम बारिश हुई थी तब पूरे महाराष्ट्र के साथ साथ पिंपलगांव के किसानों के फसल का भी पूरी तरह नुकसान हो गया था. किसानों को हुई इस आपत्ति के नुकसान की भरपाई देने का आदेश मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने दिया था. इस संकट की घड़ी में किसानों के खरीप और प्याज की फसल का बहुत बड़ा नुकसान हो गया था. जब इस नुकसान का पंचनामा करने के लिए हर एक गांव के तलाठी को यह काम सौपा गया तब राज्य के सभी गांवों के तलाठियों ने अपना अपना रिपोर्ट सत्य के अधार पर पेश किए परंतु पिंपलगांव के पूर्व तलाठी पी.डी.परांडकर ने अपने कार्यालय में ही बैठकर ७/१२ के प्रमाणपत्र के अधार पर रिपोर्ट बनाई जिसकी वजह से आज गांव के ८० प्रतिशत किसानों को फसल के नुकसान की भरपाई आजतक मिल नहीं पाई है. जब किसानों ने उस तलाठी महोदय को इसके बारे में पूछा तब उन्होने उन किसानों को अपमानित करने के साथ साथ अपना हक मांगनेवाले गरीब किसानों पर अपने पद का धोस दिखाकर चुप करवा दिया. परंतु इन किसानों को अपने ऊपर हुए अन्याय से रहा नहीं गया तब उन्होने गांव के सभी किसानों की ग्रामसभा बुलाकर इस तलाठी के ऊपर कानूनी कार्रवाई का ‘ठराव क्रमांक (जा.क्र.ग्रापपि दि. २६.०४.११) पास किया और उसे मालेगांव के पूर्व तहसीलदार और उपविभागीय अधिकारियों को इस आवेदन की एक प्रत दिनांक २९.०४.२०११ और १६.०५.२०११ को दी गई थी परंतु कई दिनों का लंबा इंतजार करने के बाद किसानों के सब्र का बांध टूट गया फिर उन्होने बेमुद्दत धरना आंदोलन पर बैठने का फैसला किया. उसकी नोटिस जब तत्कालीन उपविभागीय अधिकारी श्री.अजय मोरे को दी गई तब उन्होने धरना आंदोलन को रोककर किसानों को उस तलाठी पर कार्रवाई करने का आश्वासन दिया परंतु इस कार्रवाई के इंतजार में भी कई दिन बीत गए और कार्रवाई नहीं हुई तब उस गांव के एक सामाजिक कार्यकर्ता कॉ. राजेंद्र आहेर और पिंपलगांव के किसान विष्णु पवार, सयाजी पवार, लोटन पवार, तानाजी पवार, वसंत पवार, नाना पवार, दौलत पवार, शिवराम पवार, पांडुरंग पवार और दिलिप पवार ने आरटीआई कानून का सहारा लेकर दिनांक ३०.०५.२०११ को उपविभागीय अधिकारी के नाम से आवेदन दिया जिसमें उन्होने लिखा था कि किसानों को फंसानेवाले तलाठी के ऊपर क्या कार्रवाई की इस बात का जवाब मांगा. उसके जवाब में उपविभागीय अधिकारी ने उनको दि.२५.०६.२०११ के लिखे (पत्र क्रमांक/म.अ./एस आर/४२/२०११) पत्र के अनुसार बताया कि अब तक तहसीलदार का अहवाल इनको मिला नहीं है. इसलिए यह कार्रवाई हो नहीं सकती है. ‘यहां पर हम आपको बता दें कि २९.०४.११ को तहसीलदार को दिए आवेदन पर २५.०६.११ तक कोई भी जांच के आदेश नहीं दिए जाते हैं. यह सरकारी अधिकारी अपने काम में कितनी दिलचस्पी दिखाते हैं इस बात से यह पता चलता है. इस बीच उपविभागीय अधिकारी का तबादला हो जाने के बाद यहां नए उपविभागीय अधिकार के रूप में श्री.उदय किसवे जी प्रकट होते हैं. इनको भी किसान आवेदन देते हैं तब किसवे जी ने लंबे इंतज़ार के बाद दिनांक १६.०८.२०११ (मा.अ./अपील/११/११) पत्र के अनुसार जिस किसानों के फसल का नुकसान हुआ है उनको और कार्रवाई से बचते आए तलाठी पी.डी.परांडकर को २९.०८.२०११ को २.३० बजे उपस्थित रहने के लिए आदेश दिए गए. तब किसानों ने उपस्थित रहकर और एक कार्रवाई करने का आश्वासन लिया. इनकी बात किसानों को फिर से इसलिए माननी पड़ी क्योंकि इनका कोई माई-बाप नहीं है. मजबूरन इनको फिर से इंतजार की घड़ी की तरफ देखना पड़ा और फिर किसानों को सरकारी चक्रव्युह में फंसाकर १०.०४.२०१२ का दिन उजड़ गया. अब किसानों को लगा कि सवेरा हो गया परंतु इन भोलेभाले किसानों को क्या मालूम अभी भी इनकी काली रात चालू है. जब १०.०४.२०१२ के (पत्र क्रमांक/मा.अ./एस आर/२७/२०१२) पत्र के अनुसार फिर से वही बात दोहराई गई. इसमें उपविभागीय अधिकारी ने (पत्र क्रमांक/अका/कावि/८६/२०११ दिनांक १८.०५.२०११) के अनुसार किसानों को बताया कि हमने तहसीलदार से अहवाल मंगाया गया है परंतु अब तक हमें तहसीलदार से यह अहवाल प्राप्त नहीं हुआ है. मतलब एक दूसरे के कंधे के ऊपर बंदूक रखकर अपने पद का गलत इस्तेमाल करनेवाले और अपने कर्तव्यों से भटके यह उच्च अधिकारी आरटीआई कानून की अवहेलना करके इन गरीब किसानों के साथ छल कपट किया है. हद तब पार हो गई जब इन सभी के खुलासे के लिए तहसीलदार बी.डी. डोईफोडे ने ३१ किसानों को और तलाठी पी.डी.परांडकर को तहसील कार्यालय में (पत्र क्रमांक आस्था/कावि/१३५/२०१२ दिनांक १८.०५.२०१२) पत्र के अनुसार २२.०५.२०१२ को सुबह ११ बजे इन सबको उपस्थित रहने का आदेश दिया गया. परंतु २५.०५.१२ को सुबह से लेकर शाम तक ना तहसीलदार बी.डी.डोईफोडे आए ना तलाठी पी.डी.परांडकर आए. किसान सुबह से शाम तक तहसील कार्यालय में भूखे प्यासे बैठे रहे. मतलब एक तहसीलदार ने गांववालों को सरकारी पत्र पर लिखकर बुलाया था फिर भी यह उपस्थित नहीं रहे. क्या मालेगांव तहसील में मोगलाई चल रही है? या इन अधिकारियों को कानून का कोई डर नहीं है? किसानों के इस अन्याय के खिलाफ कौन आवाज उठाएगा? क्योंकि डेढ़ साल से कई आरटीआई और आवेदन देकर भी आजतक एक तलाठी के ऊपर कुछ भी कार्रवाई हो नहीं पाई और ना इन उच्च अधिकारियों ने दूध का दूध और पानी का पानी करने की कोशिश की. क्यों इस तलाठी को दो तहसीलदार और दो उपविभागीय अधिकारियों की तरफ से बचाया गया है? यह बड़ा सवाल पैदा हो रहा है. जहां सरकार किसानों को फायदा पहुंचाने के अनेक वादे करते हुए नज़र आ रही है. वही दूसरी ओर यह अधिकारी किसानों के साथ अन्याय करके ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का उदाहरण पेश कर रहे हैं. इस कृषीप्रधान देश में अगर किसानों को ही न्याय नहीं मिल रहा है तो यह किसान कहां जाएंगे. अगर इनको अपने हक का पैसा भी यह अधिकारी मिलने नहीं दे रहे हैं तो किसानों को मजबूरन अपने परिवार समेत आत्महत्या का मार्ग स्वीकार करना पड़ता है. इनके साथ बात करते हुए यह किसान कुछ ऐसा ही करने के फिराक में लग रहे हैं. जल्द ही इनकी समस्याओं की तरफ अगर ध्यान नहीं दिया गया तो आनेवाले समय में पिंपलगांव के किसान सामुहिक आत्मदहन के विचारों से प्रेरित होकर आत्महत्या करने के विचार में हैं? और इन सबकी जिम्मेदारी प्रशासन को लेनी होगी. हमने कुछ किसानों से बात की तो उन्होने हमारे सामने उनकी दुख भरी कहानी ही रख दी.

इस संदर्भ में हमने नाशिक जिले के पालक मंत्री मा.छगन भुजबल, विधायक दादा भुसे और जिला अधिकारी विलास पाटिल से बात की. उनकी प्रतिक्रियाएं.

मा. छगन भुजबल ( पीडब्ल्युडी मिनिस्टर, पालकमंत्री, नाशिक)
मैं नाशिक में कुछ काम के लिए जा रहा हूं. वहां पर मुझे किसानों की समस्याओं का निवेदन दीजिए. मैं उसे देखकर आपको जवाब देता हूं.
श्री. दादा भुसे (विधायक, मालेगांव बाह्य)
मैं पिंपलगांव के किसानों का निवेदन देखने के बाद आपको बताता हूं और मैं जरूर उनके साथ न्याय करूंगा.
श्री. विलास पाटिल (जिला अधिकारी, नाशिक)
किसानों को ऐसा ही लगता है कि तलाठी ही दोषी होता है परंतु असल में ऐसा होता नहीं है. डेढ़ साल में हमारी भी तहकिकात हुई होगी? मगर आप हमें पिंपलगांव की समस्या का निवेदन दीजिए मैं जल्द से जल्द संबंधित अधिकारियों के ऊपर कार्रवाई करने का आपको आश्वासन देता हूं.
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