स्कूल में ही २५ फीसदी लड़कियां खो देती हैं अपनी कौमार्य…

Posted on September 24 2012 by yogesh

नई दिल्ली: २१वीं सदी में खुद को मॉडर्न और खुली सोचवाला समझते हुए लोगों ने ना जाने इन शब्दों की परिभाषा कैसे निश्चित की है. आज के समाज में सलवार-कमीज पहननेवाली लड़कियों को बहन जी और विदेशी परिधानों को धारण करनेवाली लड़कियों को आधुनिक माना जाता है. आज के युवा शारीरिक संबंधों को भी बड़ी सहजता से देखते हैं. उनके अनुसार शारीरिक संबंध बनाना कोई बुरी बात तो नहीं है और फेसबुक के इस जमाने में यह सब बातें तो आम हो चली हैं.

अरे हम आपको डरा नहीं रहे बल्कि आज के युवाओं की सोच से रूबरू करा रहे हैं. आईए आपको बताते हैं कि आज के युवा शारीरिक संबंध को लेकर क्या सोचते हैं. एक वीकली मैगजीन में छपे सर्वे के अनुसार मेट्रो शहरों के स्कूलों में पढ़नेवाली हर १०० टीनेजर लड़कियों में से २५ लड़कियां शारीरिक संबंध बना चुकी होती हैं. हम बात स्कूल में पढ़नेवाली लड़कियों की कर रहे हैं जिनकी उम्र १३ से २० साल के अंदर होगी. आज की लड़कियों का कहना है कि ‘सेक्स करना कोई बुरी बात तो नही है. मेरे क्लास में तो बहुत सारी लड़कियां सेक्स कर चुकी हैं. यदि मेरे ब्वायफ्रेंड का किसी दूसरी लड़की के साथ संबंध है तो इसमें गलत क्या है, मेरे भी तो अन्य दूसरों लड़कों के साथ संबंध हैं.’

यह बातें हैरान कर देनेवाली है. आजकल के युवा एडल्ट फिल्में देखते हैं, सेक्स करते हैं और इन बातों को बड़ी सहजता से लेते हैं. इस सर्वे में यह बात भी सामने आई है कि १२वीं में पढ़नेवाले कई विद्यार्थी तो हर वक्त कॉनंडोम लेकर घूमते हैं यह सोचकर कि ना जाने कब इसकी जरूरत पड़ जाए. आपको बता दें कि आजकल मेट्रो शहरों में एक ही वक्त में कई संबंधों (मल्टीपल डेटिंग) में रहने की बात आम होती जा रही है. साथ ही ‘फ्रेंड्स विथ बेनेफिट्स’ यानी सिर्फ सुविधा के लिए बनाया गया दोस्त का प्रचलन बहुत तेजी से फैल रहा है. आजकल के युवाओं को फेसबुक में काफी दिलचस्पी है. एक सर्वे के अनुसार युवा प्रतिदिन ८ घंटे फेसबुक पर बिताते है जो कि एक वर्किंग डे के समान है.

आज कल के युवा मानते हैं कि ‘नो कमिटमेंट, नो डिमांड, नो प्रॉब्लम’. इस मूलमंत्र को अपनाते है उन्हे लगता है कि किसी भी प्रकार के भावनाओं में बंधने से वह होनेवाली समस्याओं से बचे रह सकते हैं. आज की युवा की यह सोच जिस दिशा में जा रही है वह अति चिंतनीय है. इसमें मां-बाप को अपना रोल निभाना बहुत जरूरी हो गया है. बच्चों के साथ बात करना और उनकी समस्या जानना ही इन सब पर रोक लगा सकता है.

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