काश हम राजनीति समझ पाते

Posted on September 24 2012 by yogesh

यह पब्लिक है पर कुछ नहीं जानती…
राजनेता फायदा देखते हुए बदलते हैं अपने तत्वों को

मुंबई(गौतम कोरडे): ‘यह पब्लिक है यह सब जानती है’ पर मौजूदा राजनैतिक हालातों को देखते हुए तो यही लगता है कि भारत की पब्लिक कुछ नहीं जानती. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जबसे भारत ने आजादी हासिल की है तब से ज्यादातर समय कांग्रेस ही भारत पर राज करती रही है. कांग्रेस के कार्यकाल का विश्लेषण किया जाए तो बहुत कुछ कहा जा सकता है. कांग्रेस को पछाड़कर बीजेपी एवं जनता दल भी सत्तासीन रही है, यह भी एक सच ही है. लेकिन इन राजनैतिक राजनेताओं ने हमेशा ही बढ़ती महंगाई और बढ़ती बेरोजगारी को हमेशा ही बढ़ावा दिया है. काश यह राजनीति भारत की जनता समझ पाती. लोकतंत्र देश की संसद में सांसद आपस में ही गाली गलौज करते हुए पाए जाते हैं. इसी तरह देश की विधानसभा क्षेत्र में भी कई विधायक अपने विरोधी पार्टियों पर नीचले स्तर तक पहुंचते हुए गाली गलौज और मारपीट करते हैं. यह सब इसलिए दोहराने की जरूरत पड़ती है क्योंकि विधायक, सांसद और मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री सभी देश के लोगों की सेवा करने के लिए चुने जाते हैं.

हाल ही में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए. इस चुनाव में कांग्रेस के युवराज कहे जानेवाले राहुल गांधी ने जीत के लिए अपनी पूरी ताकत दांव पर लगा दी थी. वहीं दूसरी ओर बहुजनों की हितैषी कहे जानेवाली बसपा की अध्यक्ष बहनजी मायावती ने अपनी राजकीय अजेंडे और अपने विकास कामों की गतिविधियां कई निजी चैनलों पर दिखाई थी. वहीं समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम जी और उनके बेटे अखिलेश यादव ने पूरे उत्तरप्रदेश में साइकिल चलाकर अपने पार्टी को काफी सक्षम बनाया था. उस दौरान इन तीनों पार्टियों ने एक दूसरे की इतनी आलोचना की थी उस आलोचना की चर्चाएं काफी दिनों तक लोगों के जुबान पर रहीं. इसका नतीजा यह निकला कि समाजवादी पार्टी बहुमत से जिती और अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री पद संभाला. यूपी चुनाव खत्म होने के कुछ महीनों के बाद राष्ट्रपति चुनाव काफी सुर्खियों में रहा. आखिरकार आए भी क्यों ना क्योंकि राष्ट्रपति के पद के लिए आमने सामने थे कांग्रेस के दिग्गज नेता एवं पूर्व वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और पुर्वोत्तर क्षेत्र के राजा कहेजानेवाले पी. ए. संगमा. उस दौरान सपोर्ट के लिए इन दोनों उम्मीदवारों ने देश भ्रमण कर अन्य पार्टियों के बड़े नेताओं से राष्ट्रपति पद चुनकर देने की गुहार लगाई और भ्रष्टाचार में लिप्त कई आरोपों से घिरे नेताओं के सामने जाकर इन्होने हाथ जोड़े. वह राजकीय हालातें काफी दिलचस्प रहे क्योंकि पी.ए. संगमा के करीबी शरद पवार ने उनका समर्थन ना देते हुए उनके विरोधी भाजपा ने उनका समर्थन किया. वहीं हर वक्त शिवसेना सुप्रीमों बाला साहब ठाकरे पार्टी के स्थापना से ही कांग्रेस के खिलाफ जहर उगलते रहे हैं पर कांग्रेस के राष्ट्रपति उम्मीदवार प्रणव दा को सपोर्ट किया.

साथ ही यूपी के चुनाव में एक दूसरे पर उंगली उठानेवाले बसपा, समाजवादी और कांग्रेस अंतत: कांग्रेस के नेता प्रणव मुखर्जी को ही सपोर्ट किया. तृणमुल कांग्रेस की अध्यक्ष एवं पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी सरकार के साथ होने के बावजूद भी प्रणव दा के समर्थन में नहीं खड़ी हुई. कुछ विश्लेषकों का यह कहना था कि एक ही राज्य के दो बड़े नेता कैसे हो सकते हैं. जाहिर सी बात है कि पश्चिम बंगाल के सबसे बड़े पद पर होने की वजह से यदि प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति बनते तो ममता का खिताब उनसे छिन जाता. इस राजनीति में कुछ भी हो सकता है आखिरकार ममता भी मान गईं और प्रणव मुखर्जी की बड़े मतों से जीत हुई. वहीं दूसरी ओर असम में पीछले दो महीनों से हो रहे जातीय हिंसा में कई निरपराध महिला, बच्चे और बुजुर्गों की हत्या हुई. उस क्षेत्र के मुख्यमंत्री तरूण गोगोई ने खुद कहा कि इस जातीय दंगे की जिम्मेदार खुद केंद्र सरकार है. असम के दंगा पीड़ित लोगों की पैरवी करने खुद प्रधानमंत्री को वहां जाना पड़ा फिर भी यह नरसंहार नहीं थमा. उस आसामी अमानवीय हिंसा के विरोध में रजा अकादमी ने ११ अगस्त को बड़े पैमाने पर रैली निकाली. इस रैली में कई ऐसे भयानक वारदातें हुईं जिसका जिक्र और चर्चा बड़े पैमाने पर चली. इसी के विरोध में मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने आठ दिनों के बाद ही १९ अगस्त को मुंबई गिरगांव से लेकर आजाद मैदान तक एक लाख लोगों की रैली निकाली. हिंसा के मामले में विरोध करनेवाले राज ठाकरे नें पर प्रांतीय लोगों के खिलाफ आवाज उठाई. उसके बाद भी महाराष्ट्र तथा देश में राज ठाकरे काफी सुर्खियों में रहे.

शिवसेना के कट्टर विरोधी कहे जानेवाले राज ठाकरे की पीठ भी शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे और कार्याध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने थपथपाई. देश में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जिनसे यह साबित होता है कि राजनेता अपना उल्लू साधने के लिए दोस्तों से दुश्मनी और दुश्मनों से दोस्ती कर लेते हैं. लेकिन आम जनता इस राजनीति को क्यों नहीं समझ पाती है. यदि इन पूरे मामले में किसी का नुकसान होता है तो वह केवल जनता का. एक दूसरे पर टिप्पणी कर सुर्खियों में रहना राजनेताओं का पेशा बनते जा रहा है. अंतत: सत्ता भोगने के लिए यह हमेशा एक दूसरे के साथ मिलकर ही देश को लूटते आए हैं और जनता अपनी तबाही देखते हुए भी सबकुछ भूलकर इन्ही पार्टियों को सपोर्ट करती है. चाहे कितना भी बड़ा गुनाह, दंगा, भ्रष्टाचार या आतंकवाद हो यह कुछ दिनों तक ही हमारे जहन में होता है इसका ताजा उदाहरण हाल ही में देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने दिया था. उन्होने पुणे के एक कार्यक्रम में खुले रूप में कह दिया है जिस तरह कुछ सालों पहले बोफोर्स पर चर्चा करते हुए लोग भूल गए उसी तरह लोग कोयला घोटाले को भी भूल जाएंगे.

वक्त को देखते हुए ऐसा लगता है कि उनकी बात को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि हम राजनीति नहीं जानते.

Powered By Indic IME