हंगामा है क्यों बरपा…आंदोलन जो हमने छेड़ा है

Posted on August 27 2012 by yogesh

 

मुंबई(रजिया निसार):
फिलहाल मुंबई और देश के अन्य हिस्सों में जो कुछ भी चल रहा है उस से तो एक ही बात समझ में आती है कि भारत में सबसे बड़ा मुद्दा ‘राजनीति’ ही है. राजनीति में चाहे वो पक्ष हो या विपक्ष, सभी पार्टियां अपना उल्लू साधने के फिराक में रहती हैं. लोकतंत्र, प्रजातंत्र के नाम पर वोटों की राजनीति चलती है और वोटों की तरह लोग भी बटते हैं. लोकतंत्र का अर्थ वोटों की राजनीति कर लोगों को बांटना तो कतई नही है. देश, दुनिया के किसी कोने में हंगामा होता है तो शांति प्रदर्शन के नाम पर उसका खामियाजा मुंबई के लोगों को भरना पड़ता है. सभी दल, राजनैतिक पार्टियां यही रट लगाए रहती हैं कि मेरे आंदोलन करने पर ही क्यों हल्ला मचाया जा रहा है, पर क्या सिर्फ इतना ही कह देने से हमारा कर्तव्य पूरा हो जाता है.

आपका ध्यान कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर खींचना चाहते हैं. असम और बर्मा में जो भी मानवीय हिंसा हुई उससे वहां के लोग तो त्रस्त हैं ही, उस हिंसा की कड़वाहट मुंबई तक पहुंच गई. रजा अकादमी तथा अन्य संस्थाओं ने असम और बर्मा में जो हुआ उसके विरोध में ११ अगस्त को मुंबई में सभा आयोजित की. हम सभा आयोजित करने पर कोई प्रश्न नहीं उठा रहे हैं परंतु विरोध के नाम पर मुंबई में जो हिंसा हुई उसका जवाबदार कौन है. इस विरोध के कारण सामान्य मुंबईकर और कुछ पुलिसकर्मियों को अपनी जान तक जोखिम में डालनी पड़ी. मुंबई में हुई हिंसा के विरोध में राज ठाकरे भी मैदान में उतर पड़े. उनका मोर्चा गृह मंत्री आर.आर. पाटिल और पुलिस कमिश्नर का इस्तीफा मांगने के लिए था. राज ठाकरे अपने इस प्रयास में सफल भी रहे और कई पुलिसवालों और सामान्य लोगों के दिल में जगह बनाने में भी कामयाब रहे. परंतु सवाल यहां यह उठता है कि क्या राज ठाकरे वास्तव में लोगों के दर्द को समझते हुए यह विरोध कर रहे थे या कई दिनों से पर्दे के पीछे रहने की वजह से फिर अपनी वही धाक जमाना चाहते थे? पाबंदी होने के बावजूद भी चौपाटी से आजाद मैंदान तक अपना मोर्चा निकाला.

आंदोलन और विरोध प्रदर्शन के नाम पर जो भी हंगामा हो रहा है उसका नतीजा सिर्फ मुंबईकरों को भुगतना पड़ रहा है. राजनैतिक पार्टियां अपना काम करती हैं और अपनी राजनीति चमकाते हैं. आंदोलन के नाम पर आखिर कब तक लोग इकट्ठा होंगे और इस तरह से प्रदर्शन करते रहेंगे और राज्यों की सरकार और केंद्र सरकार कब इस पर ठोस कदम उठाएगी? क्या ऐसे हालात में जहां देश का एक राज्य असम आग में जल रहा है वहां दूसरे राज्य में भी हिंसा को हवा देना उचित है? ऐसी परिस्थिति में तो देश के सभी नेता, धर्मगुरुओं और विचारकों को साथ आना चाहिए और अपना स्वार्थ छोड़ देश के हित के लिए बोलना, सोचना चाहिए, क्योंकि राजनीति से कहीं ऊपर है देश और देश के लोग.

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