सरकार सुस्त और प्रशासन मस्त

Posted on July 30 2012 by pits

महाराष्ट्र राज्य में कामों की फाइलों का मंत्रालय के हर एक विभाग में एक तरह का पहाड बन गया है. क्योंकि अभी फिलहाल में मंत्रालय में लगी आग की वजह से पहले से ही फाइल्स पेंडिंग चल रही थी, उसमें आग लग जाने से ‘सोने पे सुहागा’ जैसी हालत हो गई है. कई हजारों फाइल्स इसमें राख हो गई है और जो भी नई फाइल्स इनके पास आई है उस पर भी कई दिनों से धीमी गति से काम चल रहा है.

आम जनता बडी उम्मीद के साथ मंत्रालय में अपना काम करने के लिए महाराष्ट्र के कई गांवो से आती है. परंतु यहां के प्रशासन का धीमा रवैया देख अपने आप को कोसने के अलावा इनके पास कोई चारा नही होता है, क्योंकि ये शिकायत करें भी तो किसे. शिकायत आखिर में उन्हीं वरिष्ठ अधिकारियों के पास जाती है जो इस फाइल्स के उपर काम कर रहे है. जनता की तरफ से सरकार टैक्स लेने में वक्त नही लगाती है, तो क्या सरकार की यह जिम्मेदारी नही बनती है कि आम जनता का काम करने के लिए भी सरकार पर वक्त की पाबंदी होनी चाहिए, क्योंकि कई कामों को सालों साल लग जाते है फिर भी काम नही बनते दिखाई देते है. इस विषय में पूछने पर सत्ता पार्टी में बैठे लोग तो अपने अच्छे कामों का डंका पिटेंगे और उनकी आवाज में विरोधी पार्टी के लोग भी दब जाते है. इन्हीं के सरकार में बैठे मंत्री भी मुख्यमंत्री के धीमे कामकाज पर नाराज है और इनकी सहयोगी पार्टी एनसीपी ने तो लगभग इनसे पल्ला झाड लिया है. यानी इनके ही गठबंधन वाली सरकार मे एकता का अभाव है. अगर जनता इन्हें चुनकर देती है यह एहसास के साथ कि अपना काम करनेवाला कोई तो है. पर गाँव, तालुका और जिले से चुनकर आने के बाद यह लोग मंत्रालय में आकर किसका प्रतिनिधित्व कर रहे है यह संशोधन का विषय बनते जा रहा है. अपने कार्य को यह भूलते जा रहे है. कुछ विरोधी पार्टी के नेता अपना निजी काम निकालने के लिए सत्ता पार्टी के मंत्री महोदय के कक्ष में हमेशा दिखाई देते है. इस बात पर भी उनके पास जवाब यह रहेगा की मैं तो अपने चुनावी क्षेत्र की जनता का ही काम लेकर गया था. इनके छलावे से आजतक कोई बच पाया है. इनकी इस आदत की वजह से प्रशासन में बैठे वरिष्ठ सरकारी अधिकारी भी इनकी ही नकल करते है और जनता के कामों में बडा वक्त लगा देते है. काम उनका ही जल्द होता है जो उनकी डिमांड पूरी करता है फिर वो पैसे की हो या अन्य. जिसके पास संपत्ति के भंडार है वह तो अपना काम कर लेगा परंतु जिसके पास पैसा नही है वह क्या करें? क्या आम जनता का काम ईमानदारी से नही होगा? या इनके भ्रष्टाचार की दुकान से ही जनता को जाना होगा? या उनको हमेशा की तरह तरस-तरस के अपना काम निकलवाना होगा. सरकारी कर्मचारी अगर चाहें तो बिना किसी भी रुकावट से लोगों का काम कर सकता है. परंतु इच्छा शक्ती की कमी और रिश्वत खाने की आदत इनको काम करने नही देती है. इसका खामियाजा गरीब, मध्यम वर्ग और पिछडे़ वर्ग को भुगतना पड़ रहा है. अगर आम आदमी किसी से शिकायत करता है तो शिकायत सुननेवाला अधिकारी भी उनसे रिश्वत की मांग करते है. ऐसे मे जाए तो कहां जाए? इसी कश्मकश में कभी-कभी वह आत्महत्या भी कर लेता है. तो इसकी जिम्मेदारी सरकार को नही लेनी चाहिए? भ्रष्टाचार की इस गंगा का आखिर तो होगा? कब तक देश की सरकारें और मस्त मवाल प्रशासन अपनी जिम्मेदारी समझेगा? या तो यह हो सकता है कि यह लोग किसी क्रांति की राह तो नही देख रहे है? इन सब गंभीर मुद्दों को इन्हें जल्द समझना होगा. वर्ना वक्त इनके हाथों से निकल जाएगा.

मुंबई (चंदन पवार) Email: chandanpawar.pits@gmail.com

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