योगगुरू श्रीमती.हंसाजी जयदेवा योगेन्द्र

Posted on June 25 2012 by pits

मेरूदंड

शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिये मेरूदंड का बहुत महत्व है, यह बहुत कम लोग जानते हैं. सही व्यायाम न होने के कारण आरामदायी सोफासेटस् और स्प्रिंगवाले गद्दो की आदत होने के कारण, आधुनिक मनुष्य अपना स्वाभाविक डौल, अंगविन्यास बिगाड़ देता है और पुरे शरीर को हानि पहुँचाता है.

ऐसे कहा जाता है कि मनुष्य को सीधे तनकर बैठना, तनकर खडे होना और सीधे तनकर चलना चाहिए. अगर मेरूदंड को सीधा रखा जाए तो कुछ बिमारी होने की सम्भावना कम होती है. दोषपूर्ण अंगविन्यास से (Posture) आंतरिक अंगो में बिगाड़ आता है, और फिर आगे जाकर सिरदर्द, थकान, नाडियों में तनाव आदि हो सकता है.

योग कहता है कि मेरूदंड सीधा और लचीला होना चाहिए. मानसिक और शारीरिक स्वास्थय के लिए शरीर को सही डौल में (proper carriage) रखना जरूरी है क्यों कि शारीरिक डौल और मन की स्थिति में एकदम निकट का संबंध है. इसलिए मेरूदंड के स्नायु और मांसपेशियों को लचीला रखना चाहिये ताकि मेरूदंड सीधा रख पाएं.

जब हम सही कसरत करना टालते है, हमारे स्नायुओं में कमजोरी आती है और मेरूदंड विचलित (Deviation) होता है. जिससे मेरूदंड के रक्ताभिसरण में असर पड़ता है. ऐसी स्थिति में मज्जा कि कोषिकाओं को पूरा पोषण नहीं मिलता और आखिर में उनका नाश होता है. इस तरह से शरीर के काफी कार्यो में रूकावट आती है और पूरे नाडी़ तंत्र में बिगाड़ हो जाता है.

इसलिए इन सब बातों को ध्यान में रखते हुअे और जब देखा कि रोजमर्रा की जिंदगी में मेरूदंड को सही व्यायाम मिलने की सम्भावना नही, योगियों नें मेरूदंड के लिए कुछ आसन विकसित किये. इन आसनों से मेरूदंड को आगे, पीछे, ऊपर, बाजूमें ऐसे सब तरफ खिंचाव मिलता है.

  • चक्रासन, धनुर्वक्रासन, उष्ट्रासन, भुजंगासन आदि में पीछे की ओर खिंचाव मिलता है.
  • योगमुद्रा, पश्चिमोत्तनासन, हलासन आदि में आगे की तरफ खिंचाव आता है.
  • कोणासन मे बाजू की तरफ झुकाव आता है.
  • तालासन, यष्टिकासन में ऊपर की ओर खिंचाव मिलता है.
  • वक्रासन और अर्धमत्स्येंद्रासन में मेरूदंड में ऐंठ  (Twist) मिलता है.

शवासन में कठिन जमीनपर लेटने के कारण मेरूदंड को उसकी सही स्थिति मे रखा जाता है. और इससे व्यक्ति को संपूर्ण रूप से शिथिल होने में मदद मिलती है. शिथिलीकरण से स्नायुओं को नाडी़ संबंधी तनाव से आराम मिलता है और इसलिए नाडी़ संस्थान के स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्व रखता है.

योग के सुखासन, वज्रासन, पदमासन आदि ध्यानात्मक आसनों मे मेरूदंड को एकदम सीधा और जमीन को लंबवत  (Perpendicular) रखा जाता है. इसमें किसी प्रकार का तनाव नही होता. इससे मेरूदंड में रक्तप्रवाह सुधरता है और आखिर मे एकाग्रता और ध्यान में मदद करता है.

ये सब आसन केवल सुधारने के लिए नही़ लेकिन चिकित्सा में भी मदद करते है. इसके अलावा आसन मानसिक संतुकन और अध्यात्मिक विकास में भी मदद करतें है. आखिर में व्यक्ति की योग्यता के अनुसार उसके अंतिम ध्येय की ओर ले जाता है, जो है आत्मज्ञान (Self Realization)

जो व्यक्ति सीधे बैठते है वे ज्यादातर खुशमिजाज होते है और जो झुककर बैठते है वे मनसे दुखी या निराश होते है. उनके व्यक्तित्व में उठाव नही होता. जब मेरूदंड मे कुछ खराबी  (Defect) होती है और उसके कारण मस्तिष्क में रक्ताभिसरण ठीक तरह से नही होता, तब व्यक्ति झुक कर बैठता है.

योग का शिक्षण केवल शरीर के लिए नही किंतु वह मनोकायिक  (Psychosomatic) मन तथा शरीर दोनों के तरफ ध्यान देता है. योगी जानते थे कि मन को शरीर से अलग नही किया जा सकता. मन का शरीर के स्वास्थ्य पर नाडी़ संस्थान के द्वारा बहुत प्रभाव पड़ता है. अगर नाडी़ संस्थान पर काबू पाए, तो मन भी नियंत्रित कर सकते हैं और बेहतर एकाग्रता कर सकते है. श्री योगेंद्रजी कहते थे, “जिंदगी की सभी सफलताएँ – शारीरिक, मानसिक, नैतिक या अध्यात्मिक सफलता एकाग्रताशक्ती पर निर्भर करती है.

मेरूदंड और नाडी़ संस्थान योग में प्रमुख माने जाते है और उन्हें सबसे उत्तम स्थिति में रखना हमारा कर्तव्य है.

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