मर्द कहाँ जाए? पुरुषो के अधिकार हो रहे है सीमित….

Posted on May 28 2012 by pits

आज की 21 वीं सदी मे महिलाओ को अधिकार मिलना एक देश के विकास मे बढोतरी होने जैसा है. इन्हे मिले अधिकारो से आज देश की महिला कितनी सक्षम हो रही है इसमे हम उदाहरण के रूप मे सोनिया गांधी, ममता बैनर्जी, जयललिता, मेधा पाटकर, सुषमा स्वराज और राष्ट्रपती प्रतिभाताई पाटिल और ना जाने कितनी महीलाएं अपना नेतृत्व बखुबी अच्छी तरह निभा रही है. परदे के पिछे जो घर संभालने वाली महिला भी आज अपना घर नौकरी कर बच्चो को संभालकर परिवार को  चला रही है. यह बात अपने आप मे बहुत ही गौरांवित है. आज महिलाओ को एक अच्छे नजरिए से देखा जाता है. देश की सभी व्यवस्थाओ मे उनका सम्मान किया जाता है. अब की महिला पुरुषो के कंधे से कंधा मिलाकर चलना सिख गई है, परंतु आज पुरुषो के अधिकारो के ऊपर महिलाओ के अधिकार हाबी होने लगे है क्योंकि आज देश के चुनावो मे 50 प्रतिशत आरक्षण होने के कारण महिलाएं उस संस्था मे चुनकर आती है यह अच्छी बात है परंतु इसके अलावा महिलाएं अन्य चुनावी क्षेत्र मे चुनाव के लिए खडी होती है और वहां से भी जीतकर आती है यानीं 50 प्रतिशत पहले से ही आरक्षण होता है और अन्य जगहो से जितकर आने के बाद उस संस्था मे 60 प्रतिशत से भी ज्यादा महिलाएं हो जाती है. यानीं वहां पर पुरुषो की संख्या कम हो जाती है. इसके उदाहरण के रुप मे हम मुंबई महानगरपालिका मे महिलाओ का 68 प्रतिशत होना यही दर्शाता है. इसीलिए देश के कानून मे बदलाव करना जरुरी हो गया है. क्योंकि 50 प्रतिशत से ज्यादा महिलाओ को चुनाव लड़ने का अधिकार नही देना चाहिए वर्णा पुरुषो को अपने आरक्षण के लिए लड़ना पडेगा. यही नही देश मे कहीं भी जिन महिलाओ के साथ अत्याचार होते है, उनमे पहले ही पुरुषो को दोषी माना जाता है कई मामलो मे उन घटनाओ मे महिलाए भी दोषी रहती है परंतु अपने देश के कानून के मुताबित पुरुष वर्ग को दोषी मानते हुए उसे गिरफ्तार किया जाता है. इसके उदाहरण के रुप मे अभी के आईपीएल मे आरसीबी के आस्ट्रेलियाई खिलाडी ल्यूक पॉमर्शबैक के ऊपर जो आरोप किये गए है अगर सच्चाई देखी जाए तो जोहल हमीद को सीसी टीवी के अनुसार खुद ल्यूक को अपने साथ ले जाते हुए पाया गया फिर भी पता नही किस कारण से बाद मे ल्यूक के उपर जोहल हमीद ने छेडखानी का आरोप लगाया.

देश की कई घटनाओ मे पुरुषो के उपर दहेज प्रताडना के झूठे आरोपो मे भी पुरुषो को ही दोषी मानकर पूरे परिवार को गिरफ्तार कर जेल मे रखा जाता है. देखा जाए तो परिवार के लोगो का ऐसी घटनाओ से कोई संबंध नही होता है परंतु आज की नई पीढी कुछ सामान्य झगडा भी घर मे हो गया तो वह महिला पुलिस स्टेशन जाकर सभी घरवालो के उपर दहेज मांगने का केस दर्ज कर देती है, ऐसे भी आरोप लगते हुए पाया गया है. बलात्कार के मामलो मे कई महिनो के बाद महिला अपने उपर किए गए अत्याचारो का दोष उस व्यक्ति पर लगाती है जब उसकी कोई बात मानी नही जाती है. हमे यहां पर यह कहना है कि अपने खुद के मर्जी के अनुसार महिला कई दिनो तक उस पुरुष के साथ रहती है तब उसको कोई आपत्ती नही लगती है पर जब उसका कोई काम बनते हुये नही दिखता है तब वो उस व्यक्ति को गुनहगार के कटघरे मे खडा कर देती है. सभी जगह ऐसा ही होता है ऐसा हम नही मानते है परंतु यह संशोधन का विषय बना हुआ है.

देश के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्युरो के अनुसार देश मे 1,90,008 बलात्कार के मामले सामने आये है क्या सही मे इन सभी मामलो मे पुरुष ही दोषी हो सकता है यह सोचने वाली बात है? आंध्रप्रदेश के पुलिस महानिर्देशक दिनेश रेड्डी ने हालंहि मे बयान दिया कि फ़ेशनेबल और तंग कपडे पहनने से पुरुषो कि यौन की इच्छा भडकती है और बलात्कार जैसे मामलो कि संख्या मे वृद्धि होती है. लोकतंत्र के इस देश मे सभी को अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है. लेकिन पुरुष भी अपना सम्मान करे इस तरह से महिलाओ को अपने रहन सहन मे बदलाव करके अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझनी चाहिए.

देश मे कही पर भी छोटी घटना होती है तो पुरुषो को पहले से ही शक की नजर से देखा जाता है. परंतु देश कि ऐसी कई घटनाओ मे पुरुषो के साथ-साथ महिलाओ को भी शामिल हुआ पाया गया है. हमे बस यह कहना है कि इंसाफ दोनो के लिए बराबर होना चाहिए. क्योंकि वो महिला है इसीलिए एक तरफा जांच ना होकर दोनो तरफ से सच्चाई को बाहर लाना चाहिए तभी जाकर न्याय मिल पाएगा वर्णा आनेवाले दिनो मे पुरुषो के अधिकार इतने सीमित हो जाएंगे कि पुरुषो को अपने अधिकारो को लेकर लडना पडेगा.

अॅड. देवकर संभाजी - “मै पुरुषो के अधिकार सीमित हो रहे है इसमे यह कहूंगा कि किसी भी महिला को कानून का ही सहारा होता है परंतु आजकल कई महिलाएं कानून को अपने तरिके से इस्तेमाल कर पुरुषो को ब्लैकमेल करने लगी है इससे यह अंदाजा लगाना मुश्किल होता है कि सही मे वह महिला अपने हक के लिए लड रही है या जानबुझ कर उस पुरुष को आरोपी बना रही है परंतु मै यह जरुर कहना चाहूंगा कि पुरुषो के अधिकारो के बारे मे सोचने का वक्त आने लगा है.

श्रुती सिंह - “ पुरुष प्रधान देश माने जानेवाले इस देश मे अब महिलाए भी उतनी ही सक्षम है जितने की पुरुष. कभी कभी ऐसी घटनाए सामने आती है जिसमे महिलाएं दोषी पायी जाती है ऐसे मे यह कहना गलत होगा कि हर समय पुरुष ही दोषी है. आज के समय मे मुझे नही लगता कि पुरुषो के अधिकार कुछ कम हुए है. लेकिन महिलाओ को भी अपने अधिकारो का गलत इस्तेमाल नही करना चाहिए.”

सुनिल गौड – “मै अपने उपर बिती घटना आपको बताता हूं. जब मै घर से ऑफिस के लिए निकला तब मै सरकारी बस मे चढ़ रहा था और गलती से एक महिला का दुपट्टा हवा से मेरे हाथ मे आ गया उस महिला को लगा कि मैने जानबुझ कर उसका दुपट्टा खींचा इस अवस्था मे उस महिला ने चिल्लाना चालू कर बस को रोककर मुझे पिटना चालू कर दिया और बाकि महिलाओ ने भी उसका साथ दिया तो बताइएं उस घटना मे मेरा क्या दोष था? सभी लोग उस महिला का साथ दे रहे थे और जब बात पुलिस थाने तक पहुंच गयी तो वहाँ पर भी मेरी कोई बात सुनी नही गई इस तरह से एक पुरुष के अधिकार कितने सीमित है उस दिन मुझे समझ मे आया.”

दिनेश शाह – “मै महिलाओ का बहुत आदर करता हूं क्योंकि मेरे घर मे भी महिलाएं है, परंतु अब जिस तरह से आए दिन न्युज पेपर और टीवी मे खबरे सुनता हूं तब मुझे इस बात का अंदाजा हो गया है कि पुरुषो के अधिकार सही मे कम होते जा रहे है. और तो और अपना कानून गलती ना होने के बावजूद पुरुष को दोषी करार दे देता है क्योंकि वह एक पुरुष है.”

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