धर्म की आड़ में… धार्मिक स्थानों पर होता है शोषण महिलाओं का…

Posted on May 28 2012 by pits

मुंबई (गौतम कोरडे): “कहीं पढ़ा था की शांत से शांत व्यक्ति को भी भड़काने के लिए सिर्फ ज़रूरत होती है उसके धर्म पर छीटाकशी करने की.” वह धर्म जो इंसान के साथ उसके जन्म के वक्त ही जुड़ जाता है. इसमें व्यक्ति की अपनी कोई इच्छा नहीं होती यह तो बस उसके नसीब की तरह ही उसके नाम और जीवन से जुड़ जाता है. हां यह और बात है कि बुद्धिजीवियों ने संविधान के अनुच्छेद २५ में भारत के प्रत्येक व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता प्रदान की हुई है.

पर यहां सोचनेवाली बात यह है कि क्या धर्म शब्द को सुनते ही प्रत्येक व्यक्ति जिस तरह से उत्तेजित हो जाता है, वह उचित है? यदि उचित भी है तो आए दिन धर्म के नाम पर महिलाओं का जो शोषण हो रहा है वह किस हद तक ठीक है? कहते हैं धर्म को माननेवाले लोग उपरवाले से डरते हैं, उपरवाले का नाम भी लोग अलग अलग तरीके से करते हैं जैसे भगवान, अल्लाह, गॅाड या किसी भी नाम से आप उसे संबोधित कर सकते हैं. पर इन्ही जगहों पर बड़े पैमाने पर महिलाओं का शोषण होता है. कई पवित्र स्थल ऐसे भी है जहां पर आए दिन अश्लील वारदातें होती रहती हैं और यह खबरें अखबारों की सुर्खियां बनी हुई रहती हैं. अभी कुछ दिनों पहले ही एक भारतीय नन मैरी चांडी की आत्मकथा “स्वस्ति” में कैथोलिक चर्च के अंदर चलनेवाली ऐसी ही घटना का जिक्र हुआ है जो धर्म के नाम पर सदियों से चलनेवाले संकीर्ण मानसिकता की ओर इशारा करता है. इस आत्मकथा में मैरी ने यौन कुंठाओं के शिकार पादरियों के आचरण और दुर्व्यवहार का जिक्र किया है. यह अपने आप में ऐसी पहली वारदात नहीं है जो हमें अपने अंदर झाकने पर मजबूर कर रही है. इस से पहले भी सिस्टर जस्में की आत्मकथा “आमीन” में ऐसी ही बातों का खुलासा किया गया था, जो इंसान को हिला कर रख दे.

इसी तरह हिंदुओं में भी साध्वी की भूमिका पर सवाल उठते आए हैं. इसी तरह एक साध्वी ने बाबाओं के यौन उत्पीड़न से परेशान होकर सीबीआई को पत्र लिखा था, जिसकी अभी जांच हो रही है. कहने का तात्पर्य यह है कि वह कौन सा धर्म है जो इस तरह से महिलाओं का शोषण करने की इजाजत देता है? आज किसी भी धर्म के किताब में महिलाओं का एक अलग ही रूतबा रहा है. हिंदुओं में “यत्र नार्यस्तु पुजयंते रमन्ते तत्र देवता” का वर्णन किया गया है जिसके अनुसार जहां औरतों को सम्मान दिया जाता है वहां देवताओं का वास होता है ऐसा कहा गया है. इस्लाम में मां के कदमों में स्वर्ग होने की बात कही है. इसाई धर्म में माउंट मैरी का अपना ही स्थान है. इस तरह से प्रत्येक धर्म ने महिलाओं को प्रथम दर्जा दिया है. फिर वह कौन सी मानसिकता है जो धर्म के नाम पर अपनी जिंदगी को कुर्बान कर देनेवाली नन और साध्वियों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करने की इजाजत देता है.

धर्म के नाम का आडंबर रचनेवाले लोग ही ऐसी वारदातों को अंजाम देते हैं और धर्म का नाम भी बदनाम करते हैं. यह तो वह चंद महिलाएं है जिन्होने ऐसी घटनाओं पर प्रकाश डाला है वर्ना तो कई ऐसी महिलाएं है जो अभी तक अंधेरे में घुट रही हैं. जरूरत है सही धर्म को पहचान ने की. आखिर धर्म के नाम पर यह शोषण कब तक चलते रहेगा? क्या यह वही धर्म है जिसके लिए लोग अपने आप तक को भूल जाते हैं? उत्तेजित होकर इंसानियत नाम की व्याख्या को भी दरकिनार कर देते हैं? क्या ऐसी वारदातें हमें सोचने पर मजबूर नहीं करती?

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