महान राजा “महाराणा प्रताप”

Posted on May 21 2012 by pits

मुंबई (पिट्स प्रतिनिधि): राजा महाराणा प्रताप और उनके घोड़े चेतक की बहादुरी के किस्से तो हम बचपन से ही सुनते आ रहे हैं. राजा महाराणा प्रताप का जन्म ९ मई १५४० को राजस्थान के कुम्भलगढ़ में महाराणा उदयसिंह एवं माता रानी जीवत कंवर के घर हुआ था. यह उदयपुर के मेवाड़ में शिशोदिया राजवंश के राजा थे. इन्होने कई वर्षों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया. महाराणा प्रताप का नाम इतिहास के पन्नों में इनकी बहादुरी और दृढ़ प्रण के लिए अमर है. उनके द्वारा लड़ी गई लड़ाईयों में हल्दी घाटी का युद्ध काफी प्रसिद्ध है. इस लड़ाई में महाराणा प्रताप ने २०.००० राजपूतों को साथ लेकर मुगल सरदार मानसिंह के ८०.००० की सेना का सामना किया था. यह युद्ध केवल एक दिन चला था पर इसमें १७,००० लोग मारे गए थे. इसी युद्ध में उनके प्रिय घोड़े चेतक की भी मृत्यु हो गई थी.

महाराणा प्रताप वीरता के परिचायक थे. १६६० में उदय सिंह २ के राज्य में मुगल बादशाह अकबर ने चित्तौड़ पर विजय प्राप्त कर ली. ऐसी परिस्थिति में राजा उदय सिंह और शाही परिवार महल के कब्जे में आने से पहले ही वहां से भागने में कामयाब हुए और बाद में उन्होने अरावली पर्वत के पास शरण ली, जहां बाद में उन्होने उदयपुर नामक शहर का विकास किया. राजा उदय सिंह अपने प्रिय पुत्र जगमल को राज सौंपना चाहते थे पर उनके वरीष्ठ सलाहकारों ने उनके छोटे बेटे महाराणा प्रताप का नाम सुझाया. राज्याभिषेक समारोह के दौरान चुंदावत और तोमर रामशाह द्वारा जगमल को महल से निकाल दिया गया और महाराणा प्रताप को “मेवाड़ का राजा” बनाया गया. महाराणा प्रताप अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध नहीं जाना चाहते थे परंतु राज के वरीष्ठ अधिकारियों ने उन्हे समझाया कि जगमल कठिन परिस्थितियों में मेवाड़ को संभालने की क्षमता नहीं रखते.

महाराणा प्रताप ने मुगल बादशाह अकबर को कभी भी भारत का राजा नहीं स्वीकार किया और अपनी पूरी जिंदगी अपने राज्य के लिए उस से लड़ते रहे. अकबर ने सर्वप्रथम महाराणा प्रताप को अपनी बातों से जीतने की कोशिश की परंतु वह हमेशा ही असफल रहे. महाराणा प्रताप बादशाह अकबर से लड़ना नहीं चाहते थे परंतु साथ ही वह अकबर के सामने झुकना और खुद पर उनका आधिपत्य नहीं चाहते थे. साथ ही सबसे बड़ी समस्या यह थी कि चित्तौड़गढ़(चित्तौड़ महल) प्रताप का पैतृक महल, मुगल के आधिपत्य में था. जिंदगी की भागदौड़ में चित्तौड़ को वापस पाना और वहां राजपूतों की शान के परचम को लहराने का सपना महाराणा प्रताप की आंखों में था. संक्षेप में कहा जाए तो महाराणा प्रताप सिर्फ कागजों पर ही एक राजा थे उन्होने अपने जीवनकाल में किसी भी जगह पर शासन नहीं किया.

महाराणा प्रताप एक तरफ राजपूती आनबान शान के लिए संघर्ष कर रहे थे वहीं दूसरी ओर कई राजपूत बादशाह अकबर सेना के लिए काम करते थे. यहां तक की महाराणा प्रताप के अपने भाई शक्ति सिंह और सागर सिंह अकबर की सेना के लिए काम करते थे. साथ ही बहुत से राजपूत प्रमुख जैसे अंबर के राजा मानसिंह(जो बाद में महाराजा जयपुर बने) भी अकबर के सेना के संचालक थे और उनके राज दरबारियों में से एक थे. बादशाह अकबर ने छ: राजनयिक मिशन महाराणा प्रातप के पास भेजे थे जिस से कि शांतिपूर्वक वह अकबर के खेमें में आ जाए जैसे अन्य राजपूत राजा आए थे परंतु महाराणा प्रताप ने हर बार अपने आत्म सम्मान को प्रथम दर्जा दिया और ऐसी संधि करने से मना कर दिया.

महाराणा प्रताप ने कभी भी इस बात की परवाह नहीं कि परिस्थिति उनके कितने प्रतिकूल है. वह हमेशा ही अपने प्रण पर अडिग रहे और पूरी बहादुरी से अपनी आन बान और शान के मुगलों से लड़ते हे.

महाराणा प्रताप की मृत्यु एक शिकार के दौरान चोट लगने की वजह से हुई, जनवरी १९, १५९७  को चवंड में अपनी उम्र के ५७ सावन देखने के बाद महाराणा प्रताप परलोक सिधार गए. महाराणा प्रताप ने अपने पुत्र अमर सिंह को अपने पश्चात मेवाड़ को मुगलों से बचाने का उत्तराधिकार सौंपा था.

इस प्रकार ऐसे राजपूत का अवसान हो गया जिसकी स्मृति प्रत्येक भारतीय को प्रेरित कर रही है. इस संसार में जब भी वीरता और अपने वचनों के प्रति समर्पण भावना की बात होगी तब तक महाराणा प्रताप को याद किया जाता रहेगा.

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