इंकलाब जिंदाबाद…शहादत दिन, २३ मार्च

Posted on March 24 2012 by pits

मुंबई (रजिया निसार): २३ मार्च १९३१ का यह दिन भारत के इतिहास में बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है. इसी दिन देश की स्वतंत्रता के लिए शहीद भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव ने अपनी जान देश के लिए न्योछावर कर दी थी. इन क्रांतिकारियों का ऐसा मानना था कि जब तक देश के लिए आप अपना सब कुछ कुर्बान नहीं कर देते तब तक देश को आजाद नहीं कराया जा सकता. २३ मार्च को इन शहिदों की ८१वां शहादत दिन था.

बहुत ही कम उम्र में शहीद भगत सिंह ने देश को स्वतंत्र करने का सपना देख लिया था और इसी सपने के पीछे वह ताउम्र भागते रहे. उन्हे इस बात का यकीन था कि देश एक ना एक दिन स्वतंत्र जरूर होगा, भले ही वह स्वतंत्र देश को देखने के लिए जीवित ना रहे. उस दौरान हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन(HSRA) एकमात्र ऐसा संगठन था जिसमें सभी युवा क्रंतिकारी थे और देश की स्वतंत्रता के लिए जी जान से जुड़े थे. इस संगठन के विचारों से प्रभावित होकर भगत सिंह ने इस संगठन में काम करना शूरु कर दिया. इस संगठन में देश के विभिन्न जाति-धर्मों के युवा एक साथ आकर देश के लिए काम कर रहे थे. इनका ऐसा मानना था कि हम अंग्रेजो से तो आजाद हो जाएंगे पर देश में व्याप्त जाति-धर्म नामक गुलामी से कैसे आजाद होंगे? इसलिए यह देश को दोनो गुलामी से आजाद करने के लिए प्रयास कर रहे थे.

देश के इन क्रातिंकारियों का मकसद इंसानो का खून बहाना नहीं था और इसका सबूत उन्होने केंद्रीय विधान सभा के अंदर बम फेंक कर दिया क्योंकि बम फेकने का मकसद किसी की हत्या करना नही था बल्कि बहरी सरकार को अपनी स्वतंत्रता की ओर ध्यान आकर्षित करना था. अगर वह चाहते तो उस दौरान भाग भी सकते थे लेकिन देश के लिए इन्होने क्रुर अंग्रेजो के सामने आत्मसमर्पण किया और ११६ दिन जेल में बिताए. जेल में रहने के साथ साथ इन्होने अपनी स्वतंत्रता के लिए आंदोलन जारी रखा और अपनी जिंदादिली भी. मेरा र जिस से देश के लोग भी काफी आगे आए. इस इंकलाब से ब्रिटिश सरकार को अपनी नींव में दरारे पड़ती महसूस हुई और २४ मार्च १९३१ को भगत सिंह, राज गुरु और सुखदेव को दिए जानेवाल फांसी २३ मार्च की सुबह को ही अफरा तफरी में दे दी गई. इनकी इस शहादत से पूरे देश के युवाओं में क्रांति की लहर दौड़ उठी थी और आखिरकार इन क्रंतिकारियों का बलिदान रंग लाया और हमें ई.स. १५ अगस्त १९४७ को हमें स्वतंत्रता मिल गई.

वह भी एक दौर था जब युवा देश के लिए अपनी जान तक की परवाह नही करते थे. देश के लिए “मेरा रंग दे बसंति चोला” और लबों पर मुस्कुराहट लिए कुर्बान हो गए और आज हमारे देश की युवाओं को पब, क्रिकेट और फेसबुक की दुनिया के बाहर कुछ दिखाई ही नही देता. हमारे देश में ऐसे कई युवक-युवतियां हैं जिन्हे स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के बीच का फर्क ही नहीं पता होता. देश की राजनीति से उदासीन कई युवक देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के नाम से भी वाकिफ नहीं है. वहीं दूसरी ओर क्रिकेट और फिल्मों के सभी सितारों के रिकॅार्ड अपने दिमाग में रखते हैं. आज इन्हे यदि शहिद भगत सिंह के बारे में पुछा जाता है तो इन्हे फिल्मों के हिरो बॅाबी देओल और अजय देवगन के नाम ही याद आते हैं. इस बात को कहने में भी संकोच होता है कि फिल्मों ने एक बड़ा काम किया कि फिल्मों के द्वारा ही सही देश के लोगों को इन क्रांतिकारियों के बारे में पता तो चला.

 

८१वीं शहादत दिवस पर इस बात की उम्मीद की जाती है कि इन शहिदों को सिर्फ कैंडल जलाकार ही ना याद किया जाए बल्की देश के लिए इनकी जो समर्पण भावना थी उनके कुछ गुण आत्मसात करे. आज देश अंग्रेजों से तो आजाद हो गया है पर देश को बहुत सी प्रथाओं, कुरितीयों और लालच ने अपना गुलाम बना रखा है. आज देश के ५० प्रतिशत से ज्यादा लोग भूखे सोते हैं और वहीं दूसरी ओर नेताओं के जेब में ११ लाख करोड़ जैसी बड़ी रकम बड़ी आसानी से छुप जाती है. आज देश भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, मंहगाई, गरीबी, भूखमरी, जाति-धर्म जैसे अनेक प्रपंचों से जकड़ा हुआ है और जब तक देश इन पाखंडों से आजाद नहीं होता, देश के लिए जान कुर्बान कर देनेवाले शहीदों की कुर्बानी सफल नहीं होगी.

आज के प्रत्येक युवाओं को इस दिशा में सोचने की आवश्यकता है क्योंकि आज देश की बागडोर युवाओं के हाथ में ही है.

 

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