अब हमारे जीने की भी उम्मीद टूट गई है…मिल मजदूरों के घरों की किमत सरकार ने लगाई ८ लाख ३४ हजार

Posted on March 24 2012 by pits

मुंबई (चंदन पवार)

२० मार्च से आंदोलन चालु कर मिल मजदूरों की ९ संघठनो को साथ में लेते हुए सरकार को आवाज़ दी है. हमें घर दे दो साहब. १,४८,००० हजार मिल मजदूर के लिए इन संघठनाओं ने आज़ाद मैदान पर बैठकर आंदोलन शुरू कर दिया है. अपनी पूरी ज़िंदगी घर पाने के लिए दांव पर लगानेवाले मिल मजदूरों की कहानी उनकी ज़ुबान से सुनकर कोई भी रो पड़ेगा. एक समिती का गठन कर सात दिनो में घरों के मामले में यह समिती मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात रखेगी, उसके बाद सरकार द्वारा कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लेने की अपेक्षा है.

३० साल से मिल बंद पड़ने के बाद मिल मजदूरों के घर में अब तक चले आ रहा अंधेरा अब तो दूर होगा इस भरोसे कि उम्मीद सरकार से लगाई है. महाराष्ट्र की हर लड़ाई में अपनी जान की बाजी लगानेवाला मजदूर आज रस्ते पर आ गया है. जब कोई मिल मजदूर कई साल पहले मिल में काम करता था तब उसकी शान कुछ और थी, मगर आज उनकी अवस्था मिल बंद होने के बाद दो वक्त का खाना जुटाना भी मुश्किल हो गया है. घर में कमाई करनेवाले इंसान की अगर नोकरी छूट गई तो उस घर की क्या हालत होती है, ये जिस इंसान पर बीती है वही बता सकता है. मिल मजदूरों की पत्नी भी मिल बंद पड़ने के बाद कोई खाने के डिब्बे बनाने लगा, कोई सब्ज़ी बेचने लगा यानी मिला वो काम करने की बारी इनके ऊपर आयी. बच्चो की पढ़ाई उनसे छूट गई, मिल मजदूरों के बुढ़े मां बाप की दवाई के लिए भी पैसा जुटाना मुश्किल हो गया. मिल मजदूर ने जो सपने देखे थे उन्हे पूरा करना तो दूर मगर उनके बारे में सोचना भी इनके लिए बहुत भयानक है. उनकी दुनिया ही उनसे उजड़ गई. ऐसा कई साल चलते रहा, जीवन की यह गाड़ी चलाते चलाते आधे से भी ज्यादा मिल मजदूरों की मौत हो चुकी है. कुछ लोगों को अपने परिवार की अवस्था देखी नही गई इसिलिए समय से पहले चल बसे यानी जीने की उम्मीद खो बैठे, कुछ लोगों ने आत्महत्या कर ली. ऐसी दर्दनाक घटनाएं पूरे ३० साल में मिल मजदूरो ने देखी है और आज जो भी लोग बचे हुए हैं उनकी हालत बद से बदत्तर हो गई है. उनका पूरा परिवार बिखर गया है. तुकाराम नामक मिल मजदूर से जब हमने बात की तो उनका कहना था कि “मैं अपने पूरे जीवन में एक वक्त का खाना खाकर अब तक जिंदा हूँ मगर मैं चाहता हूँ कि मेरा बेटा मेरी जैसी जिंदगी ना जिए. कुछ तो उसके लिए करना चाहता हूँ. मुझे इस माय बाप सरकार से एक घर मिल जाए तो भी मैं अपने बेटे की आंख से आंख मिलाने के काबिल बन जाऊंगा.”

आज जो दो वर्गो में पैसे को लेकर जो खाई बन गई है उसे देख इन मिल मजदूरों को घर मिलना ही चाहिए. “लवासा” जैसे प्रोजेक्ट को सहुलत देने के लिए हमारे मुख्यमंत्री शरद पवार जी से घंटो-घंटो चर्चा कर सकते हैं.  तो २८० फुट का घर मिलने के लिए ३० साल से अपनी लड़ाई लड़ रहे मिल मजदूरों के लिए सही में मुख्यमंत्री जी कुछ कर नहीं सकते हैं? क्या इनको घर देकर पुण्य नहीं लेना चाहते है या इनको इच्छा ही नहीं है? सात पुस्तों के लिए कमाई कर बैठे लोग अपनी आठवीं पुस्त के लिए कैसे पैसे इकट्ठा करें, इस सोच में बैठे हैं. मगर हमारे मिल मजदूर को एक एक पैसा जुटाने के लिए अपने जिस्म से रोज पसीना बहाना पड़ता है. तब जाकर उनका परिवार एक वक्त का खाना खाता है. इस देश की व्यथा यह है की किसी भी बड़े आदमी के लिए कानून को तोड़ मरोड़ कर छूट दी जाती है या विशेष कानून बनाया जाता है. मगर मिल मजदूरों को घर देते वक्त उस घर के लिए आनेवाले हर खर्चे का हिसाब देकर ८ लाख ३४ हजार रुपये की मांग की जाती है. क्या यह सही है? क्यों इनको मुफ्त में घर नही दे सकते हैं? करोड़ों का घोटाला करनेवाले मंत्रियों को या अफसरों के उपर कार्यवाही करने का दिखावा करने के बाद छोड़ दिया जाता है. मगर अपने हक के लिए लड़ रहे इन मिल मजदूरों की पीठ पर लाठी बरसाई जाती है. कहां पर इस पाप का हिसाब देंगे? कुछ तो पुण्य करके जाओ, जो आनेवाली नई पिढ़ी आपको याद रखे. नही तो एक अच्छी पिढ़ी बनने से रह जाएगी.

Email- chandanpawar.pits@gmail.com

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