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Posted on March 3 2012 by pits

पुलिस कर्मचारियों की अवस्था, एक तरफ खाई और एक तरफ कुँआ जैसी

मुंबई (दिप झांवर):

क्राईम पॅट्रोल जैसे अपराध के विरुद्ध चलाए जा रहे टी.वी. कार्यक्रम में पुलिस कर्मियों द्वारा इतनी तेज़ी से तफतीश और अपराधियों को पकड़ते देख कई लोग कहते हुए पाए जाते हैं कि क्या सच में पुलिस कर्मी इतने तेज़ है? इतनी लगन और मेहनत से काम करते हैं? रिश्वत नहीं लेते क्या? यह एक ऐसा सवाल है जो अपने आप में शर्मसार कर देता है और हमारी पुलिस व्यवस्था पर से लोगों के उठते विश्वास को भी दर्शाता है.

शहर में बढ़ते अपराध को देखते हुए आम जनता पुलिस व्यवस्था को निकम्मी और निठल्ली समझती है. लोगों के दिमाग में अक्सर सवाल खड़े होते हैं कि जिस पुलिस पर शहर की सुरक्षा का भार है वह इतनी लापरवाह कैसे हो जाती है? बड़े से बड़े मुजरिम इनके हाथों से निकल जाते हैं और ये हाथ मलते ही रह जाते हैं. पुलिसवालों के नाक के नीचे आतंकवादी अपने मंसुबों को अंजाम दे देते हैं और हमारी पुलिस प्रशासन कुछ नही कर पाती. यह बात तो कहने में किसी को कोई संकोच नही होता कि पुलिसवालों में इमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और उत्तरदायित्व की भावना की सरासर कमी हैं.

पर हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. पुलिसवालों के भी बारे में हमने एक ही राय बना ली है, उसके आगे ना सोचना चाहते हैं ना समझना. बढ़ते भ्रष्टाचार, अपराध को देखते हुए ये कहना लाज़मी है कि कहीं ना कहीं पुलिस प्रशासन ढिलाई बरत रही है. पर इस बात से भी इंकार नही किया जा सकता कि आज पुलिसवालों की जो हालात हैं वो काफी हद तक दयनीय है. इनकी आर्थिक और मानसिक स्थिती हमेशा पशोपेश में रहती है. आज मँहगाई इतनी बढ़ गई है कि दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए भी लोगों को संघर्ष करना पड़ता है. ऐसे में हर व्यक्ति अपनी आमदनी को लेकर चिंतित है. अगर गौर किया जाए तो पुलिसवालों की सैलरी बहुत ही कम है. जो ऊँचे ओहदे पर होता है वह एक हद तक तो सुरक्षित है पर जो निचले दर्जे पर मुहिम सँभाले हुए हैं, उनके लिए यह कहना उचित नही होगा. जिन लोगों के ऊपर समाज को सुरक्षित रखने का जिम्मा है वह आर्थिक रुप में खुद ही सुरक्षित महसूस नहीं करते. भारत की पहली आईपीएस महिला अधिकारी किरन बेदी ने भी इन मुद्दों पर सवाल खड़े किए थे. पुलिसवालों के बच्चों के लिए शिक्षा की बातें भी सिर्फ कोरे कागजों की खूबसूरती बढ़ाती हुई नज़र आती है, जमीनी रूप में यह खोखले ही नज़र आते हैं.

मुंबई में १० व्यक्तियों पर १ पुलिसकर्मी निर्धारित किया गया है पर क्या मुंबई में बढ़ते अपराध को देखते हुए यह अनुपात सही लगता है? यहाँ आए दिन त्योहार होते रहते हैं जिनमें इन पुलिसकर्मियों को सुरक्षा के लिए तैनात किया जाता है. पर इनके काम को सुचारू रुप से निर्धारित नही किया जाता जिस से ऐसे मौकों पर तनाव की परिस्थिती पैदा होती है.

इन सबके लिए आवश्यक है कि पुलिस प्रशासन को सही दिशा में अग्रसर किया जाए. इनके वेतन और रहन सहन के स्तर में वृद्धि लाने के प्रयत्न किए जाए. साथ ही यह भी आवश्यक है कि यदि पुलिस सशक्तिकरण की बात की जाती है तो वह केवल पन्नों पर या बहस का ही मुद्दा ना बनकर रह जाए, बल्कि प्रयत्न में भी लाया जाए.

Email- deepjhavar@pitsnews.com

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